धर्मधारा


राष्ट्रके उत्थानका कार्य, स्वार्थान्ध एवं सत्तालोलुप लोग नहीं कर सकते हैं, वे सत्ता पाने हेतु एक साथ आ सकते हैं; किन्तु स्वार्थसिद्धि नहीं होनेपर वे त्वरित पृथक भी हो जाते हैं, उनके लिए राष्ट्र और समाजका कोई महत्त्व नहीं होता ! इस देशके सात दशकका लोकतंत्र यही हमें बताता है।



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