वाणी अनुसार नामजप (भाग – ३)
वाणी अनुसार नामजप (भाग – ३)
वाणीके अनुसार नामस्मरण चार प्रकारका होता है – वैखरी, मध्यमा, पश्यंती और परा । इन वाणियोंमें नामजप क्रमशः कण्ठ, ऊर्ध्व प्रदेश, हृदय और नाभिसे निसृत होता है ।
हम सर्वप्रथम प्राथमिक अर्थात वैखरी वाणीके जो दो प्रकार हैं उसके विषयमें जान लेते हैं –
उच्च स्वरसे जो जप किया जाता है, उसे वैखरी वाणीका जप कहते हैं । वैखरी वाणीके उच्चारणमें कण्ठ, तालू, मूर्धा, जिह्वा, ओष्ठ आदिका प्रयोग होता है, जिससे उच्चारके पश्चात हमतक ही सीमित न रह कर दूसरोंतक भी पहुंचता है । इसकी एक उपांशु अवस्था भी है जिसे फुसफुसाहट भी कहते हैं । इस अवस्थामें उच्चारित शब्दको कोई और नहीं सुन सकता है ।
हमारेद्वारा किए गए जपको जब कोई दूसरा सुन सके तो उसको वैखरी वाणी अन्तर्गत वाचिक जप कहते हैं । वाचिकसे उपांशु अधिक सूक्ष्म होनेके कारण, उसे करते रहनेसे वह शीघ्र ही मानसिक जपमें परिवर्तित होनेकी सम्भावना रहती है और मनकी एकाग्रतामें भी वृद्धि होती है । (क्रमशः)
जय हो तनुजा जी,
बेहद महत्वपूर्ण व उपयोगी,thnx
कुँवर अशोक सिंह राजपूत,
वरिष्ठ पत्रकार