अब समझमें आया कि उत्तर प्रदेशके इतने सारे मुख्यमन्त्री शासकीय आवास क्यों नहीं खाली करना चाहते थे ? मैं सोचती थी कि शासकीय आवासमें ऐसा क्या है जो ये इतने सारे मुख्यमन्त्री अपनी कुण्डली जमाए हुए हैं ! समाचार सूत्रोंसे ज्ञात हुआ है कि दलितोंका उद्धार करनेका बीडा उठानेवाली मायावती ‘महोदया’ने अपने शासकीय बंगलेमें ‘मात्र १०० कोटि’ रुपए व्यय किए थे और अखिलेश यादव ‘महोदय’ तो न्यायालयसे फटकार मिलनेपर जब शासकीय निवास खाली करने हेतु बाध्य हुए तो भूमिपर लगे इटलीके टाइल्स और स्नानागारके उपकरण सर्व उखाड कर ले गए ! आजके नेता इतने निकृष्ट हो चुके हैं कि उन्होंने इस राष्ट्रको देना सीखा ही नहीं है, मात्र लेना सीखा है, ऐसे नेता समाज और राष्ट्रका उत्थान कभी कर सकते हैं क्या ? आदर्श स्थिति तो यह होनी चाहिए थी कि जैसा वास्तु शासनने दिया है उसमें थोडा-बहुत सुधार यदि अति आवश्यक हो तो करवाकर उसे अगले मुख्यमन्त्रीके लिए त्वरित छोडना चाहिए था और जिस वास्तुमें इतने दिवस इस राष्ट्रने रहनेका सौभाग्य दिया उसमें यदि कोई सुधार की हो तो उसे वैसे ही छोड कर जाना चाहिए; किन्तु स्वार्थान्ध लोग तो राजनीतिमें मात्र भोग करने आते हैं, ऐसेमें उनसे ऐसी कृति होना स्वाभाविक है !
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