साधक किसे कहते हैं ?
जब कोई स्वयंप्रेरित होकर नियमित तन, मन, धन, बुद्धि और अहंका त्याग करता है अर्थात् जो उसके पास हो उसका त्याग, निष्काम भावसे, मात्र ईश्वरीय कृपा सम्पादन करने हेतु सातत्यसे अनेक वर्षतक, बिना किसी बाह्य प्रोत्साहनके, साधनारूपमें करता है, उसे ‘साधक’ कहते हैं । जबतक साधनाके इस मापदण्डमें उतार चढाव आता रहे और उसे समय-समयपर प्रोत्साहन हेतु बौद्धिक मार्गदर्शन चाहिए होता है, तबतक व्यक्ति स्वयंको साधक कहलानेका अधिकारी नहीं होता ।
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