धर्मधारा


यदि कोई अंग्रेजी बोलनेवाला व्यक्ति प्रत्येक वाक्यमें चार हिन्दी और चार उर्दूके शब्द डालकर बात करे या उसकी अभिव्यक्तिमें व्याकरणकी अनेक चूकें हों तो लोग उन्हें हेय दृष्टिसे देखकर उनका उपहास करेंगे, नहीं, नहीं, प्रत्यक्षमें उपहास करते हैं !; किन्तु हिन्दी भाषामें दो वाक्य भी शुद्ध रीतिसे अर्थात संस्कृतनिष्ठ नहीं लिख पानेवाले स्वयंको आधुनिक और बुद्धिजीवी समझते हैं ! आजकी हिन्दी भाषाकी स्थिति देखकर समझमें आता है कि शिक्षाका स्तर इस देशमें कितना गिर चुका है और स्वभाषाभिमान तो आजके ‘बुद्धिजीवियों’में रहा ही नहीं ! इस देशमें बुद्धिजीवी कहलानेके अधिकारी कौन ?, इस मापदण्डका भी ह्रास नहीं, लोप हुआ है !!



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