धर्मधारा


सभी मर्यादाओंके परे, परमेश्वर स्वरूपी कृष्णसे एकरूप होने हेतु मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम समान प्रथम आचरण करना पडता है । जैसे कालातीत होने हेतु कालके महत्त्वको समझकर कार्य करना पडता है, त्रिगुणातीत होने हेतु प्रथम सात्त्विक बनना पडता है । एक चरणको साध्य करनेपर ही दूसरे चरणमें हमारा प्रवास होता है ।



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