उत्तिष्ठ कौन्तेय !


सम्पूर्ण विश्वकी वर्तमान अर्थव्यवस्था मात्र धनाढ्योंका ही भला कर रही है, इसे परिवर्तित करने हेतु हिन्दू राष्ट्र रुपी राजकीय व्यवस्था है एकमात्र पर्याय

ख्रिस्ताब्द २०१० से सम्पूर्ण विश्वके धनाढ्योंकी सम्पत्ति प्रत्येक वर्ष १३% के मानसे बढी है, जबकि इतने ही समयमें एक सामान्य श्रमिकका (मजूदर) वेतन मात्र २% प्रतिवर्षके मानसे बढा है । सम्पूर्ण विश्वमें आर्थिक सर्वेक्षण करनेवाली संस्था Oxfam ने अपने नूतन प्रतिवेदनमें इस तथ्यको उजागर किया है और इसके अनुसार वर्तमान अर्थव्यवस्था सर्वत्र मात्र धनाढ्योंका ही भला कर रही है । इस ब्यौरेमें बताया गया है कि गत वर्ष जितना धन कमाया गया, उसमें से ८२% सम्पूर्ण विश्वके मात्र १% धनी लोगोंके नियन्त्रणमें चला गया । इन धनाढ्योंकी सम्पत्तिमें एक वर्षमें ४८ लाख ६० सहस्र कोटि रुपयेकी वृद्धि हुई । जबकि सम्पूर्ण विश्वके ३७० कोटि निर्धन लोगोंकी सम्पत्तिमें कोई वृद्धि नहीं हुई है । सम्पूर्ण विश्वमें गत वर्ष हर दो दिनमें एक नया अरबपति बना है, इस समय सम्पूर्ण विश्वमें २ सहस्र ४३ अरबपति हैं और इनमेंसे १०१ भारतमें हैं ।
इससे ज्ञात होता है कि सम्पूर्ण विश्वकी राजकीय एवं आर्थिक दोनों ही व्यवस्थाएं, सामाजिक उत्थान हेतु कितनी अहितकारी हैं ?
जिस व्यवस्थासे जनमानस या निर्धनोंकी स्थितिमें सुधार न हो, वह व्यवस्था कल्याणकारी कैसे समझी जा सकती है ? इस स्थितिको परिवर्तित करने हेतु राम-राज्य समान ‘हिन्दू राष्ट्र’की स्थापना सर्वप्रथम भारतमें करनी होगी एवं तत्पश्चात सम्पूर्ण विश्व, इसका अनुकरण स्वयं आगे बढकर करेगा अर्थात ख्रिस्ताब्द २०५० तक सम्पूर्ण विश्वमें हिन्दू राष्ट्र आधारित सामाजिक एवं राजकीय वयवस्था व्याप्त हो जाएगी ! – तनुजा ठाकुर



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