अनेक बार कुछ अहिन्दू धर्मद्वेषके कारण एवं कुछ हिन्दू अज्ञानतावश कहते हैं कि हिन्दू धर्ममें अनेकों व्रत-त्योहार एवं धार्मिक उत्सव हैं, जो हमें व्यर्थ लगता है ! यथार्थमें हमारे धर्ममें, वर्षके दो तिहाई भागमें कोई-न-कोई व्रत-त्योहार या धार्मिक उत्सव होनेके पीछे अत्यन्त गूढ कारण निहित है । सामान्य गृहस्थके लिए मोह-मायाके बन्धनोंको तोडकर साधना हेतु समय निकालना अत्यंत कठिन होता है; किन्तु हमारे मनीषियों एवं धर्मज्ञोंको यह ज्ञात था कि मनुष्य जीवनका मूल ध्येय ईश्वरप्राप्ति है; अत: यदि कोई गृहस्थ वर्षके दो-तिहाई भागमें धर्म एवं ईश्वर हेतु कुछ-न-कुछ प्रयत्न करेगा तो गृहस्थ आश्रमके २५ वर्ष पूर्ण होते-होते, उसमें ईश्वर और साधना हेतु निश्चित ही प्रेम निर्माण हो जाएगा, जिससे वह वानप्रस्थ आश्रमकी ओर सहज ही प्रवृत्त हो सकेगा । क्या इतना सूक्ष्म चिन्तन एक गृहस्थको साधनामें प्रवृत्त करने हेतु अन्य किसी धर्ममें किया गया है ?
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