इस बारकी धर्मक्रान्तिमें (२०१८-२०२२) सामाजिक प्रसार माध्यमोंका (सोशल मीडियाका) सर्वाधिक योगदान रहेगा और सबसे विचित्र बात यह होगी कि इस धर्मक्रान्तिके पश्चात इस उपक्रमका अस्तित्त्व तीसरे विश्व युद्धके कारण नष्ट हो जाएगा ! जी हां, २०२४ से सर्व सामान्य व्यक्तिके लिए न कोई अंतर्जाल होगा, न ‘फेसबुक’, न ‘whatsapp’, न ‘ट्विटर’ । तीसरे विश्व युद्धके अग्निकुण्डमें सब स्वाहा हो जाएगा और यह समाज हित हेतु अच्छा भी होगा !
प्रकृति भी अपना सन्तुलन बनाने हेतु क्या-क्या रचती है ?, यह सोच रही हूं ! सचमें यह उस मकडी जैसी है जो अपनी इच्छासे जब चाहे अपना जाल रचती है और जब चाहे उसे निगल जाती है ! ऐसी परम शक्तिशाली प्रकृति-परमेश्वरीको नमन है !
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