विदेशमें कुछ लोगोंको लगता है कि यदि वे ‘प्याज’-लहसुन नहीं खाते हैं तो उनका भोजन शुद्ध होता है । मैं फरवरी २०१३ में दुबईमें एक परिवारमें रुकी थी, वे प्याज-लहसुन भी नहीं खाते थे और उसका उन्हें बहुत अहम् भी था । जब उस घरकी गृहिणी मेरे लिए भोजन लेकर आई तो उसमें एक फीटका सूक्ष्म काला आवरण था ! कुछ क्षणोंके लिए मैं आश्चर्यचकित हो गई, उन्होंने स्नान इत्यादि करके बडी श्रद्धासे भोजन बनाया था । मेरे लिए दूसरोंके घरोंमें भोजनके ऊपर काला आवरणका होना, यह सामान्यसी बात है !, किन्तु यहां सामान्यसे अधिक प्रमाणमें काले आवरणका होना, वह भी बिना प्याज-लहसुनके भोजनमें, मेरे लिए शोधका विषय था । मैंने प्रार्थना कर भोजनको प्रसादके रूपमें परिवर्तित कर ग्रहण कर लिया । संध्या समय वे हमें दुबईके सुप्रसिद्ध मॉलमें घुमाने ले गए । मैंने उन्हें पहले ही बता दिया था कि मैं २०० मीटरसे अधिक नहीं चल सकती हूं; अतः उन्हें जहांसे अपनी आवश्यकताके कुछ वस्तुएं लेनी थी, हम वहीं गए थे; किन्तु जब उस मॉलमें गई तो मुझे सारी स्थिति समझमें आ गई । गो भक्षकोंद्वारा भोजन या खाद्य सामग्रीको बार-बार स्पर्श करनेसे वहांकी सर्व सामग्रीमें दो-दो फीटका काला आवरण था ! उस स्त्रीने अपनी ओरसे भोजन बनाने हेतु जो प्रयास किए थे, उससे एक फीटका आवरण ही नष्ट हो पाया था ! उस दिवस रात्रिमें वार्ता करते समय उन्होंने बताया कि उन्हें अवसाद है, उनकी एक पुत्रीको (सात वर्ष) श्वासरोग (दमा) है और दूसरी पुत्रीको (३ वर्ष) भी कुछ समस्या थी, अभी मुझे स्मरण नहीं है !
मुसलमानी देशोंमें हिन्दू धन अर्जित करनेके लिए चले तो जाते हैं; किन्तु वहांके दूषित अन्न-जलको ग्रहण करते रहनेसे कुछ कालमें उन्हें ऊपर एक सूक्ष्म मोटा काला आवरण निर्माण हो जाता है, जो भिन्न मानसिक और शारीरिक रोगोंका कारण बनकर उनके जीवनको क्लेशप्रद बना देता है । विशेषकर अहिन्दू अनिष्ट शक्तियां सात्त्विक जीवात्माओंसे गति हेतु उन्हें कष्ट देती हैं या उनके शरीरमें प्रवेश कर, उन्हें कष्ट देनेका प्रयास करती हैं, जिसे मायाके रंगमें रंगे हिन्दुओंको भान भी नहीं होता है ! इसी प्रकार २०१४ में मैं दुबई गई तो एक व्यक्ति जो प्रवचनमें आए थे, वे मुझे हठकर अपने घर शारजाह ले गए । उनके बहुतलीय भवनमें घुसते ही जैसे मेरी श्वास अटकने लगी ! मुझे ज्ञात नहीं था कि वे शारजाहमें रहते हैं । मुझे समझमें नहीं आ रहा था कि ‘लिफ्ट’में मुझे इतनी घुटन क्यों हो रही है, उनके घर पहुंचनेपर ही मैं श्वास ले पाई । कुछ समय पश्चात मुझे ज्ञात हुआ कि मैं दुबईसे शारजाह आ गई हूं । उस समयतक शारजाह एक ‘कट्टर मुसलमानी’ स्थान था वहां कोई मन्दिर नहीं था और न ही हिन्दुओंके दाह संस्कार हेतु कोई अन्त्येष्टि स्थल; इसलिए उसके स्पन्दन दुबईसे अधिक कष्टप्रद थे ! आप सोच रहे होंगे कि यदि मुझे कष्ट होता था तो मैं विदेश क्यों जाती थी ? जैसे शोध करते समय वैज्ञानिकोंको बहुत-कुछ ऐसा करना पडता है, जो नहीं चाहते हैं, वैसे ही हमें भी अपने मनके विरुद्ध जाकर, मानव कल्याणके लिए ये तथ्य प्रत्यक्षमें जुटाने पडते हैं और इस क्रममें हमें कष्ट भी बहुत होता है; किन्तु यही हमारी साधना है । एक वर्ष पश्चात इस शारजाहवाले कुटुम्बसे मेरा सम्पर्क टूट गया था; किन्तु गत वर्ष उन्होंने हमारे आश्रममें सन्देश देकर बताया था कि उनकी पत्नीको कर्करोग हो गया है; अतः उनकी शल्यक्रियाके सफल होने हेतु हम प्रार्थना करें, इस निवेदनके साथ उन्होंने सन्देश भेजा था !
सामान्यत: सात्त्विक कुटुम्बके लोग यदि विदेश जाते हैं तो उन्हें अधिक कष्ट होता है, ऐसा मेरा शोध कहता है । सम्बन्ध विच्छेद, मनोरोग, बच्चोंको असाध्य रोग होनेकी ऐसे लोगोंको अधिक होनेकी आशंका होती है । आपको मेरी बातपर विश्वास न हो तो आस-पास जो आपके परिचित या परिजन विदेश गए हों, उनका अभ्यास करें, आपको मेरे शोधसे निकले निष्कर्ष सत्य प्रतीत होंगे ! (इन सबपर उपाय आगेके लेखोंमें साझा करूंगी !) (क्रमशः)
Leave a Reply