जुलाई २०१३ में हम कुछ साधक जर्मनीसे इटली कारयानसे आ रहे थे । मैंने कुछ स्थानोंपर देखा कि वहांके कुछ वृक्षोंमें फल लदे हुए हैं और नीचे भी बिखरे पडे हैं ! ये वृक्ष घरके परिसरमें होते थे । मैंने एक साधकसे जिज्ञासावश पूछा कि क्या ये लोग फल नहीं खाते हैं या तोडते हैं या नीचे गिरे हुए फल नहीं उठाते हैं, ये फल पूर्ण रूपसे पके हुए हैं; किन्तु वे नीचे गिरकर सड क्यों रहे हैं ? उन्होंने जो कहा वह मेरे अत्यधिक आश्चर्यचकित करनेवाला तथ्य था ! उन्होंने कहा कभी-कभी कुछ कारणवश कुछ यूरोपीय अपने फलके वृक्षमें कीटनाशक औषधि नहीं छिडकवा पाते हैं और ऐसेमें वे फलको हाथ भी नहीं लगाते हैं; जब वे पककर गिरने लगते हैं तो उसे उठाकर कूडेदानमें डाल देते हैं ! उन्होंने कहा, “यहां बिना कीटनाशक औषधि छिडके फल खाना प्राणघातक हो सकता है !” मैंने सोचा, ये कैसे देश हैं ?, जहांके फलको नैसर्गिक रूपसे ग्रहण नहीं किया जा सकता है अर्थात बिना रासायनिक प्रक्रियाके अर्थात विष (कीटनाशक रासायनिक पदार्थ विष ही होता है) डाले बिना खाने योग्य नहीं होता ! सत्य तो यह है कि जहांसे वैदिक सनातन धर्मका अस्तित्व नष्ट हो जाता है वहांकी प्रत्येक वस्तु विषैली हो जाती है और एक उदाहरण देती हूं ! मुझे निसर्ग अत्यधिक आकर्षित करता है तो स्वाभाविक है पुष्प भी बहुत अच्छे लगते हैं । यूरोपीय लोगोंका पुष्प प्रेम उल्लेखनीय है, वे अपने घरों या बालकनी या आंगन या भीतको पुष्पोंसे बहुत सुन्दरसे सजाते हैं; इसलिए वहां भेंटमें पुष्पके पौधे देनेका भी प्रचलन है और यह उनका एक मुख्य रुचिपूर्ण कार्य भी होता है । यदि मेरा स्वास्थ्य ठीक रहे तो मैं प्रातःकाल टहलने जाती हूं, या यूं कहूं कि स्वस्थ रहने हेतु और सतत सूक्ष्म आघातके कारण बिछावन न पकड लूं; इसलिए मैं प्रातःकाल थोडे समयके लिए टहलती हूं । वैसे सूक्ष्म इन्द्रियोंके जागृत होनेके कारण और सूक्ष्म क्षेत्रमें शोध करनेकी विशेष अभिरुचिके कारण मुझे मात्र ३४ वर्ष की आयुसे वृद्धावस्थाके सर्व ‘सुख’ (जैसे चल न पाना, भोजन पचा न पाना, अधिक बोल न पाना, बैठ न पाना) प्राप्त होने आरम्भ हो गए थे और इसलिए अब मुझे ऐसे ‘सुख’से भय नहीं लगता, किन्तु जबतक देह है, वह गुरु कार्य कर सके इसहेतु आयुर्वेदके अनुसार अपनी दिनचर्याका पालन करनेका प्रयास करती हूं और यही कारण है कि मेरे चिकित्सकीय परीक्षणमें कभी कुछ भी निकलता नहीं है और चिकित्सक मुझे स्वस्थ बताते हैं तथा मानसिक रूपसे स्वस्थ होनेके कारण इतने आघात सहनेपर थोडे प्रमाणमें धर्मकार्य भी कर पाती हूं ।
जब मैं टहलने जाती थी तो वहां एक ‘श्मशानी’ शान्तिकी अनुभूति होती थी तो निश्चित ही मनको प्रिय नहीं लगती थी, पुष्प सुन्दर होते थे, किन्तु उसमें दैवी आकर्षण नहीं होता था ! मुझे ज्ञात हुआ कि रावणकी सोनेकी लंका भी ऐसी ही होगी !
वहांके अधिकांश पुष्पोंमें सुगन्ध नहीं होती । एक दिवस हमारे वाहनमें ईन्धन भराया जा रहा था । मेरा मन वहीं लगी पुष्प वाटिकाकी ओर गया । मैं एक पुष्पको प्रेमसे सहलानेहेतु आगे बढी तो एक साधकने कहा उसे स्पर्शसे न करें, वह विषैला है ! ऐसे ही एक दिवस हम कुछ साधक जर्मनीमें एक उद्यानमें गए, जो वहांका दर्शनीय स्थलोंमेंसे एक है, वहां कुछ पुष्प लगे थे, मैं उनके निकट जाने लगी तो जिनके घर हम रुके थे, वे कहने लगे, उस पुष्पके आस-पास न जाएं, उसके मकरन्दसे श्वासके कष्ट हो सकते हैं ! ऐसे ही तीन चार और भी प्रसंग हुए ! मैं समझ गई, ये ‘मायावी नगरी’ है, यहांकी वस्तुएं भी मायावी हैं और इसलिए विदेशी पुष्प देवी-देवताओंको चढाए नहीं जाते हैं । दुबईके कृष्ण मन्दिरमें आज भी भारतसे सात्त्विक पुष्प आयात किए जाते हैं ! – तनुजा ठाकुर
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