धर्म अधिष्ठित आचरण करनेसे ही स्त्रियां होती हैं सम्मानकी पात्र !


पाश्चात्य देशोंका यदि खरा इतिहास पढा जाए तो ज्ञात होगा कि उनके यहां स्त्रियोंको पशु समान भी नहीं देखा जाता था, विवाहरूपी संस्था तो उनके यहां थी ही नहीं, इससे ही उस समाजमें स्त्रीका क्या स्थान होगा ?, यह ज्ञात होता है ! उनके यहां स्त्री मात्र भोग और वासना तृप्तिकी माध्यम हुआ करती थीं । एक-दो शताब्दी पूर्वसे ही उन्हें (स्त्रियोंको) ‘मनुष्य’ समझा जाने लगा और उन्हें उनके अधिकार दिए जाने लगे; किन्तु धर्मका अधिष्ठान न होनेके कारण स्त्रियोंने अकस्मात मिले इस स्वतन्त्रतासे अपने अधिकारोंका दुरुपयोगकर, स्वेराचार (अपनी मनमानी) करने लगीं और स्त्री स्वतन्त्रताके नामपर सार्वजनिक रूपसे नग्न या अर्धनग्न होकर, वे अपनी उच्छृंखलताका परिचय देकर समाजको कामुकताकी ओर मोडने लगीं । और स्त्रीकी इस उच्छृंखलताको उस विकृत, मलेच्छ संस्कृतिके पुरुष समाजने ‘बोल्डनेस’की उपमा देकर अपने नेत्रोंके माध्यमसे वासना तृप्ति आरम्भ कर दी और दुःख की बात यह है कि आज यह विकृत मानसिकता भारतीय समाजमें भी परिलक्षित होने लगी है ।  इन्हीं सब तथ्योंका ध्यान रख हमारे मनीषियोंने स्त्रियोंको धर्म अधिष्ठित स्वतन्त्रता दी थी और एक स्त्री होकर भी मैं इसका पूर्ण रूपेण समर्थन करती हूं । और पुरुषोंको परस्त्रीको मातृरूपमें देखेनेके स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं, जिससे समाजमें उच्छृंखलता निर्माण न हो । – तनुजा ठाकुर (६.९.२०१७)



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