जुलाई १३, २०१८
‘राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि’ विवादपर ‘शिया वक्फ बोर्ड’ने शुक्रवारको कहा कि वह मुसलमानोंके भागकी भूमि राम मन्दिरके लिए दान करना चाहता है । उच्चतम न्यायालयमें ‘शिया वक्फ बोर्ड’के अधिवक्ता एस. एन.सिंहने समितिका पक्ष रखा ।
अधिवक्ताने कहा कि मुसलमानोंके भागमें आई एक तिहाई भूमिपर उनका अधिकार है; क्योंकि बाबरी मस्जिद मीर बाकीने बनवाई थी । मीर बाकी शिया मुसलमान था; इसलिए सुन्नी मुसलमानोंसे उक्त मस्जिदका कोई सम्बन्ध नहीं है । समितिने कहा कि इलाहबाद उच्च न्यायालयद्वारा मुसलमानोंको दी गई एक तिहाई भूमिपर राम मन्दिर बनानेके लिए दान किया जाएगा ! हम इस प्रकरणको शान्तिके साथ सुलझाना चाहते हैं ।
मुस्लिम पक्षकारों और ‘सुन्नी वक्फ बोर्ड’की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवनने अपना पक्षा रखा । उन्होंने कहा कि ‘जैसे बुद्धकी प्रतिमाओंको ‘मुस्लिम तालिबान’ने नष्ट किया, ठीक वैसे ही बाबरी मस्जिदको ‘हिंदू तालिबान’ने नष्ट किया ।
इससे पूर्व उत्तर प्रदेश शासनने गत शुक्रवारको हुई सुनवाईमें कहा था कि मुस्लिम पक्षकार प्रकरणको टालनेका प्रयास कर रहे है ।
उत्तरप्रदेश शासनने कहा था कि वर्षोंसे लम्बित इस प्रकरणमें मुस्लिम पक्षकार वर्ष १९९४ में इस्माइल फारुखी प्रकरणमें दिए निर्णयमें लिखी उस टिप्पणीपर पुनर्विचार करनेकी विनती कर रही है, जिसमें कहा गया था कि मस्जिदमें नमाज पढना इस्लामका अभिन्न अंग नहीं है ।
उत्तरप्रदेश शासनकी ओर से प्रस्तुत ‘एडशिनल सॉलिसिटर जनरल’ (एएसजी) तुषार मेहताने कहा कि लगभग एक शताब्दीसे इस विवादके अन्तिम रूपसे परिणामका प्रतीक्षा हो रही है । उन्होंने कहा कि शीर्ष न्यायालयने उक्त टिप्पणी वर्ष १९९४ में की थी; लेकिन अबतक इसे लेकर कोई याचिका नहीं की गई और न ही वर्तमान अभियोगमें की गई ।
उन्होंने कहा कि ‘राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद’पर इलाहाबाद उच्च न्यायालयका निर्णय आनेके पश्चात वर्ष २०१० में उच्चतम न्यायालयमें विनतीकी गई है । यहांतक कि इस प्रकरणमें प्लीडिग (पत्रक कार्रवाई) पूर्ण होनेतक इस प्रकरणको नहीं उठाया गया ।
ज्ञात हो कि प्लीडिग लगभग दो माह पूर्व पूर्ण हुई थी । ‘एएसजी’ने कहा कि अब जाकर इस प्रकरणको उठाया जा रहा है । अब कहा जा रहा है कि इस टिप्पणीपर पुनर्विचार करनेकी आवश्यकता है और इस प्रकरणको बडी पीठके पास विचार करनेके लिए भेजा जाना चाहिए । उन्होंने कहा कि ऐसा करना प्रकरणको विलम्ब करनेका प्रयास है । साथ ही ‘एएसजी’ने कहा कि मुस्लिम पक्षकारोंका यह कहना कि १९९४ के निर्णयमें की गई टिप्पणीके आधारपर इलाहाबाद उच्च न्यायालयने अयोध्या प्रकरणमें निर्णय दिया था, यह गलत है । उन्होंने कहा कि न्यायालयने निर्णय लेने से पूर्व ५३३ साक्ष्यों, ८७ साक्षीके कथन, १३९९९ पृष्ठके लिखित-पत्रोंके अतिरिक्त विभिन्न भाषाओंके लगभग १००० पुस्तकोंपर विचार किया था ।
इससे पूर्व मुस्लिम पक्षकारोंकी ओरसे वरिष्ठ वकील राजीव धवनने कहा कि शीर्ष न्यायालयद्वारा यह टिप्पणी करना गलत है कि मस्जिद इस्लाम धर्मका अभिन्न अंग है ।
उन्होंने कहा कि इस्लाम कहता है कि मस्जिद उसके धर्मका महत्वपूर्ण अंग है, बडी पीठको इस टिप्पणीपर विचार करना चाहिए । उन्होंने इलाहाबाद उच्चन्यायालयद्वारा २.७७ एकड विवादित स्थानको तीन भागोंमें बांटनेके निर्णयको पंचायतके निर्णयसे तुलना की ।
सुनवाईके समय पीठने कहा था कि अभी वह यह तय करेगा कि १९९४ के निर्णयमें की गई इस टिप्पणीपर बडी पीठके पास पुनर्विचारके लिए भेजा जाना चाहिए या नहीं ?
स्रोत : अमर उजाला
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