विदेशमें रहनेवाले हिन्दुओंकी दु:स्थिति, कारण एवं निवारण (भाग – ७)


विदेश जानेपर अधिकांश हिन्दू अपनी पारम्परिक वेशभूषाका सर्वप्रथम परित्याग कर देते हैं और विदेशी पाश्चात्योंका वस्त्र धारण करनेमें गर्व अनुभव करते हैं ! वैसे आज भारतमें भी स्थिति कुछ ऐसी ही है ! विदेशमें अधेड आयुकी स्त्रियां भी पाश्चात्यों जैसे वस्त्र धारण करने लगती हैं, उनके बेडौल देहपर वह कैसा लग रहा है, इसका भी उन्हें भान नहीं होता, उन्हें तो बस पाश्चात्यों जैसा दिखना होता है और मैंने तो यह भी पाया है कि अधिकांश पुरोहित भी जब देवालयमें पूजा करने आते हैं, तब वे भारतीय परिधान धारण करते हैं और पुनः जाते समय पाश्चात्य वस्त्र पहन लेते हैं ! धर्माभिमान और धर्म शिक्षणके अभावके कारण हिन्दुओंको आज अपने पारम्परिक वस्त्र पहननेमें लज्जा आती है, इसीसे सोच लें, हमारे देशमें धर्मग्लानि किस सीमा तक हो चुकी है ! जब मैं इटलीमें थी तो कुछ युवा पीढीके जिज्ञासु, मुझे स्विट्जरलैण्ड जानेका आग्रह करने लगे, उन्होंने मुझसे कहा, हम आपको चलने नहीं देंगे, आपको कारयानमें बैठे-बैठे ही कुछ स्थान दिखा देंगे ! मैंने सोचा आते-जाते समय इन्हें कुछ तो धर्म और अध्यात्मके दृष्टिकोण मिल जाएंगें; अतः मैंने उस यात्राके लिए हामी भर दी । इटलीके कुछ साधक और जिज्ञासु जो जानते थे कि मेरा स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता और कुछ दिवस पूर्व ही मुझे अत्यधिक ज्वर भी हो गया था, वे कहने लगे, “आप ऊनी पेण्ट पहन लें; क्योंकि वहां बहुत ठण्डी होगी और इससे आप पुनः अस्वस्थ हो सकती हैं, वहां साडी पहन कर न जाएं !” मैंने हंसते हुए कहा, “मैंने अपने जीवनमें कभी पुरुषोंवाले पाश्चात्योंके वस्त्र धारण नहीं किए हैं तो आज कैसे कर सकती हूं ! जैसे आपको विश्वास है कि पतलून (पेण्ट) पहननेसे मुझे ठण्ड नहीं लगेगी, वैसे ही मुझे विश्वास है कि हमारी दैवी संस्कृतिके वस्त्र मेरा रक्षण करनेमें समर्थ होंगे !  तो उन्होंने कहा, “आपको हिमपर (बर्फपर) तो आपको बहुत ठण्ड लगेगी, मैंने कहा, “कश्मीरमें हमारे पूर्वज वैदिक संस्कृति अनुसार ही वस्त्र धारण करते थे, वह स्थान भी स्विटजरलैण्ड समान ही ठण्डा है; इसलिए आप सब चिन्ता न करें !” सात्त्विक वस्त्रोंके तेजसे मेरा प्रतिकूल वातवरणमें भी रक्षण होगा ऐसा मेरा विश्वास है और वैसा ही हुए जब हम एक पर्वतपर गए तो वहां सर्वत्र दो घण्टे पूर्व ही हिमपात हुआ था और अत्यधिक ठण्ड थी ! हम सब वहां एक घण्टा रुके और मुझे एक छींक भी नहीं आई, जबकि वाहन और बाहरके तापमानमें २८ डिग्री  सेल्सियस तकके तापमानका अन्तर था !
जब जर्मनीमें एक अभियन्ताके (सॉफ्टवेर इंजिनियर) बच्चोंके लिए आयोजित ‘बाल संस्कार वर्ग’में हमने बच्चोंको बताया कि ‘कमसे कम’ व्रत-त्यौहारमें या घरमें हमने पारम्परिक भारतीय वस्त्र पहनने चाहिए तो बच्चोंके अभिभावकको यह बात अच्छी नहीं लगी, वे कहने लगे इससे अध्यात्मका क्या सम्बन्ध है ? वे बच्चोंको गीता सिखाते हैं ! गीतामें सत्त्व, रज और तमके विषयमें बहुत वृहद और सुन्दर विश्लेषण है, किन्तु आज मन और बुद्धिपर इतना तमोगुणका आवरण होता है कि गीताके गूढ तत्त्व अधिकांश लोगोंको समझमें कहां आते हैं ? वे कहने लगे यह तो सम्भव ही नहीं है, हम जहां रहते हैं हमें उनके जैसे ही रहना चाहिए ! मुझे मेरी चूकका भान हुआ कि ये यहां भोग करने आए हैं, इन्हें योगकी (साधनाकी) शिक्षा नहीं देनी चाहिए, वस्तुत: उनके भोगमें किसी भी प्रकारका व्यवधान उन्हें अच्छा नहीं लगता !
किसी भी संस्कृतिको यदि नष्ट करना हो तो उसके भोजन, वेशभूषा और भाषाको नष्ट कर दें, वह संस्कृति स्वतः ही नष्ट हो जाएगी ! विदेश जाकर हिन्दू इन तीनोंका सर्वप्रथम त्याग करते हैं और उसके पश्चात कहते हैं कि मुझे कष्ट हो रहा है, अब मलेच्छोंके (गोभक्षकको मलेच्छ कहा गया है) देशमें उनके जैसे तामसिक आचरण और भोजन करेंगे तो आपको दुःख नहीं तो क्या सुख मिलेगा ?
वैसे हिन्दू यदि चाहे तो वे विदेशमें भी अपने घरमें अपनी संस्कृति और संस्कारका पालन कर सकते हैं; किन्तु हमारी वैदिक संस्कृति कितनी श्रेष्ठ है और सत्त्व गुण आधारित है, यह ज्ञात न होनेके कारण और पाश्चात्योंका अन्धा अनुकरण करनेमें और तमोगुणी जीवन प्रणालीको अपनानेमें अपना बडप्पन समझते हैं ! इससे अधिक बुद्धिभ्रष्टता और क्या हो सकती है ? – तनुजा ठाकुर (क्रमश:)



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