‘ये शब्द साधनाके सन्दर्भमें हैं, यह ध्यानमें न रखते हुए एक साधकने साधनामें पत्नीके विरोधको ‘परेच्छा’ समझ साधना करना बन्द कर दिया । एक जिज्ञासुने प्रश्न किया, “मित्र मदिरापानका आग्रह करे तो मदिरापान करना उचित है क्या ?” यहां ध्यानमें रखने योग्य बात यह है कि ऐसे प्रसंगोंमें परेच्छाके स्थानपर ‘ईश्वरेच्छा’ क्या होगी ? इसका विचार करना चाहिए । ईश्वर कभी भी साधना मत करो, अथवा मदिरापान करो, ऐसा कहेंगे क्या ? सारांश यह कि अपने मनका विरोध होनेपर भी साधनाकी दृष्टिसे पूरक ऐसी परेच्छाका स्वीकार करें तथा जो पूरक न हो ऐसी परेच्छाका स्वीकार न करें !’
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