बीएचयू और IIT- IIMमें कोट्यावधिका भ्रष्टाचार


जुलाई १८, २०१८

बीएचयू, आइआइएम अहमदाबाद और कोलकातामें कोट्यावधि रुपयोंकी वित्तीय अनियमितता सामने आई है । इन संस्थानोंमें जहां शिक्षकोंके जीपीएफ और सीपीएफपर शासनकी ओरसे निर्धारित मूल्यसे अधिक दरपर ब्याज भुगतानका खेल हुआ । वहीं आइआइटी मुम्बई तथा चेन्नईमें भत्ते और मानदेय भुगतानमें भारी गडबडी पकडी गई । कोट्यावधि रुपयेकी इन गडबडियोंपर संस्थानोंने स्पष्टीकरण दिया, परन्तु देशकी सबसे बडे ‘ऑडिट विभाग’ने (CAG) उन्हें नकार दिया ।

इन संस्थानोंने मानव संसाधन विकास मन्त्रालयके दिशा-निर्देशोंको न मानकर धन अपव्यय किया । विशेष बात है कि देशके प्रसिद्ध तकनीकी और प्रबन्धन संस्थान मानव संसाधन विकास मन्त्रालयके (MHRD) दिशा-निर्देशोंको हवामें उडाते रहे, परन्तु मन्त्रालयने कुछ किया नहीं ! वो भी तब, जब कैगने इनको मन्त्रालयके संज्ञानमें भी लाया । कैगके प्रश्नोंपर एमएचआरडी चुप रहा । वर्ष २०१८ के विवरण नम्बर चारमें कैगने इन गडबडियोंका वर्णन किया है।

भ्रष्टाचार कैसे हुआ, यह जाननेसे पूर्व नियम समझ लीजिए । वास्तवमें, वित्त मन्त्रालयके परामर्शके पश्चात एमएचआरडीने फरवरी २००४ में सभी स्वायत्तशासी संस्थानोंको एक आदेश जारी किया कि जीपीएफ और सीपीएफपर उतने दरसे ही ब्याज दिया जाए, जितना वित्त मन्त्रालयने निर्धारित किया है । यह भी संस्थान अपनी स्थिति देखते हुए निर्धारितसे अल्प दरपर भी ब्याजका भुगतान कर सकते हैं, परन्तु देशके तीनों बडे संस्थानोंने इन निर्देशोंको मना कर दिया ।  कैगके निरीक्षणके समय पता चला तीनों संस्थानोंने २०१०-११ से २०१५-१७ के मध्य ६.२८ कोटि रुपयेका अनियमित ब्याज कर्मियोंपर लुटा दिया । वित्त मन्त्रालयने २०१५-१६ के लिए जीपीएफ व सीपीएफपर ८.७० प्रतिशत ब्याज दर निर्धारितकी थी, परन्तु बीएचयूने इस अवधिमें ९.२० प्रतिशतकी उच्च दरसे १.७५ कोटि रुपये अधिक, कर्मियोंको दिए ! इससे पूर्व २०१२-१३ में ९.३० प्रतिशतकी दरसे १.१७ कोटि रुपयोका अनियमित भुगतान हुआ । आइआइएम अहमदाबादने तो १२ प्रतिशतकी दरसे जीपीएफ और सीपीएफपर ब्याज बांटे ।

जून २०१७ में आइआइएम अहमदाबादने स्पष्टीकरणमें कहा कि २००४ में एमएचआरडीकी ओर से दिए दिशा-निर्देश उसपर लागू नहीं हैं । संस्थानने यह भी तर्क दिया कि लाभको देखते हुए कर्मियोंको ब्याजका अतिरिक्त लाभ देनेका संस्थापकोंने निर्णय किया था । इसी तरह बीएचयूने मई २०१७ में दिए अपने स्पष्टीकरणमें अनोखा तर्क दिया । संस्थानने कहा कि २०१२-१३ में अधिक दरपर ब्याज दिया गया, क्योंकि इस मध्य मदन मोहन मालवीयकी १५० वीं जयन्तीका आयोजन था और २०१५-१६ में बीएचयूकी स्थापनाका शताब्दी वर्ष मनाया जा रहा था । बीएचयू प्रशासनके इस उत्तरको कैगने बेकार बताया है; यद्यपि आइआइएम कोलकाताने अपनी चूक अवश्य स्वीकार की और सितम्बर २०१७ में कहा कि ब्याजका भुगतान गलत प्रकारसे हुआ था, इसमें सम्बन्धित कर्मियोंसे पैसे लिए जाएंगे ।

कैगने आइआएम अहमदाबादके उत्तरको नकारतेकरते हुए कहा कि जब किसी संस्थानका पीएफ नियम ‘पीएफ एक्ट १९२५ के सेक्शन ८(२)’के अन्तर्गत अधिसूचित होता है तो उसे सरकारकी ओरसे निर्धारित ब्याज दरका पालन करना अनिवार्य है । उधर जब कैगने विवरण बनानेसे पूर्व मानव संसाधन विकास मन्त्रालयसे उत्तर मांगा तो दिसम्बर २०१७ तक कोई उत्तर ही नहीं दिया गया ।

इसी तरह आइआइटी मुम्बईमें मानदेय वितरणमें ९.७६ कोटि रुपयेकी वित्तीय अनियमितता पकडमें आई । निरीक्षणके समय पता चला कि जनवरी २००६ से मार्च २०१७ तक आइआइटी मुम्बईने विशेष भत्ते और मानदेयके नामपर ९.७६ कोटि रुपये अयोग्य प्रकारसे व्यय किए । अप्रैल २०१७ में मन्त्रालयने मुख्य लेखा नियन्त्रकको बताया कि भारतीय प्रौद्यौगिकी संस्थान (आइआइटी) पूर्ण रूपेण केन्द्र शासनसे वित्तपोषित होते हैं ।

इस प्रकार किसी तरहका भत्ता देनेपर उन्हें मन्त्रालयसे अनुमति अवश्य लेनी है ।

स्रोत : लाइव हिन्दुस्तान



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