नामजप यदि भावसहित किया जाए तो वह हमारे प्रारब्धकी तीव्रताको तो नष्ट करता ही है, साथ ही संचित कर्मोंको नष्टकर हमारे लिए मुक्तिके द्वारको खोल देता है; इसलिए आद्य गुरु शंकराचार्य सहस्रनाम भाष्यमें कहते हैं – यन्नामकीर्तनं भक्त्या विलापनमनुत्तमम् ।
मैत्रेयाशेषपापानां धातूमिव पावकः ।।
अर्थात जैसे अग्नि सुवर्ण आदि धातुओंके मलको नष्ट कर देती है, ऐसे ही भक्तिसे किया गया भगवानका कीर्तन सब पापोंके नाशका अत्युत्तम साधन है; अतः अपने सर्व कर्म करते हुए नामजप करें और अपने जीवनको ईश्वरका एक अनुष्ठान समझकर उसका आनन्द लें ।
Leave a Reply