मुसलमानोंको गोमांस (बीफ) खाना बन्द कर देना चाहिए, इस्लाहममें भी यह ‘हराम’ है : वसीम रिजवी
अलवरमें गो-तस्करीकी आशंकामें भीडद्वारा कथित रूपसे पिटाईके कारण एक व्यक्ति रकबर खानकी मृत्यु होनेके पश्चात ‘मॉब लिंचिंग’पर सर्वत्र इस विषयपर बहस हो रही है । इसी कडीमें ‘आरएसएसस’ नेता इन्द्रेश कुमारने वक्तव्य देते हुए कहा है कि यदि देशके लोग गोमांस भक्षण करना बन्द कर दें तो देशमें मॉब लिंचिंगकी घटनाएं रुक जाएंगी ! ‘शिया वक्फद बोर्ड’के अध्यक्ष वसीम रिजवीने भी इन्द्रेश कुमारके वक्तव्यका समर्थन करते हुए कहा है, ”मुसलमानोंको गोमांस खाना बन्द कर देना चाहिए । गो-हत्या बन्द होनी चाहिए । इस्लाममें भी गायका मांस ‘हराम’ है, आप मॉब लिंचिंगको रोक नहीं सकते; क्योंकि हर स्थानपर सुरक्षाकी व्यवस्था नहीं की जा सकती; अतः ऐसा कानून बनाना चाहिए, जिससे गो-हत्या करनेवालेको कठोरसे कठोर दण्ड मिले !”
इसके साथ ही वसीम रिजवीने यह भी कहा, ”इंद्रेश कुमारका वक्तव्य महत्वपूर्ण है, किसीकी धार्मिक भावनाओंको आहत नहीं करना चाहिए । किसी समुदायने यदि किसीको मांका स्थान दिया है तो आप उसकी हत्याह नहीं कर सकते !”
हिन्दू बहुल देशमें रहकर मुसलमान गौ माताकी हत्या करते हैं, उनका मांस भक्षण करनेका अक्षम्य अपराध करते हैं औरयहांका कशासन ऐसे अपराधको रोकने हेतु कोई प्रतिबन्ध नहीं लगाता है, यह सबसे दुखद बात है । निर्लज्जताकी परिसीमा तो यह है कि भारत गोवंशके मांसका सबसे बडा निर्यातक है ! जब इस देशमें मुसलमानोंको गौ हत्या करनेका अधिकार है तो हिन्दुओंको गौ माताके रक्षणका अधिकार क्यों नहीं ? हम भीडद्वारा किसी गौ तस्करकी हत्याका समर्थन नहीं करते हैं; किन्तु आज भी हमारी सैकडों गौ माता प्रतिदिन मुसलमान कसाईयोंके हाथों बलि चढती हैं, सर्वत्र गो तस्करीके माध्यमसे मुसलमानोंके गोमांसकी क्षुधाको तृप्त किया जाता है, जिस कारण गोवंशकी संख्यामें भारी गिरावट आई है ! अपनी गोमाताकी इस भीषण संहारके क्रमको हिन्दू कब तक सहेगा ? किञ्चित सोचें !
जिस हिन्दू बहुल राष्ट्रने मुसलमानों और उनके पूर्वजोंको संरक्षण दिया और भारत जैसे महान देशका नागरिक कहलानेका अधिकार दिया, उस देशमें सबसे पवित्र और पूजनीय मानी जानेवाली गौ माताके मांसका मुसलमानोंद्वारा भक्षण करना, क्या इस देशके और यहांके लोगोंकी भावनाओंका घोर अनादर करना नहीं है ? क्या मानवीय आधारपर भी ऐसे कुकर्म क्षम्य हैं ? और दूसरा सच यह है कि रिजवी और अब्दुल कलाम जैसे विद्वानोंकी बात धर्मान्धोंको अंशमात्र भी नहीं भाता, इन्हें तो अन्धविश्वासी, अर्धशिक्षित और कट्टर कठमुल्लोंकी बातें अच्छी लगती हैं जो मुसलमानोंको मात्र अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने हेतु इस्लाम और कुरानका आधार देकर दिशाभ्रमित करते हैं । – तनुजा ठाकुर (२५.७.२०१८)
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