एक साधिकाने कहा, “मैं एक आध्यात्मिक संस्थासे चार वर्षोंसे जुडी हूं और एक घंटे अपने घरमें रहकर अपने केंद्रसेवकद्वारा बताई सेवा भी करती हूं; किन्तु मुझे वहांके उन्नत या संतसे व्यष्टि साधनासे सम्बंधित योग्य मार्गदर्शन नहीं मिलता है ?, मैं इससे निराश हूं !”
ऐसी स्थितिमें अपनी व्यष्टि साधना और समष्टि साधनाको बढानी चाहिए, संतोंकी दृष्टि अपनी ओर आकृष्ट करने हेतु परिवाद (शिकायत) न करें, अपने प्रयास बढायें | आपके प्रयास बढनेपर सन्त मात्र आपका मार्गदर्शन ही नहीं करेंगे, आपके घरतक आकर अपना प्रेम उडेलेंगे ! इस घोर कलियुगमें संतोंको भी व्यष्टि और समष्टि साधना करनेवाला जीव चाहिए| अल्प प्रयासकर, किसी आध्यात्मिक संस्था या गुरुको दोषी न ठहराएं !
Leave a Reply