आजके बुद्धिप्रामाण्यवादियों एवं धर्मद्रोहियोंका वाद-विवादमें अग्रसर न होनेका कारण
आदि शंकराचार्यने विरोधी पण्डितोंसे वाद-विवादकर उन्हें पराजित किया । आजके बुद्धिप्रामाण्यवादी तथा धर्मद्रोहियोंको वाद-विवादमें पराजित करना सम्भव नहीं; क्योंकि उन्हें धर्मका लेशमात्र भी अभ्यास न होनेसे वे वाद-विवाद करने हेतु अग्रसर नहीं होते !
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