वृद्धावस्थामें आनन्द हेतु बाल्यकालसे ही साधना करें !


पूर्वकालके वृद्ध गृहस्थका मुख मण्डल तेजसे चमकता रहता था; क्योंकि वे बाल्यकालसे ही साधना और धर्मपालन करते थे । आजके अधिकांश वृद्ध गृहस्थके मुख तेजसे विहीन होता है और चिन्ताके चिह्न उनके मुखपर स्पष्ट दिखाई देते हैं । ईश्वरपर आस्था न होनेके कारण उन्हें अपन भावी पीढीकी चिन्ता जीवनके अन्तिम अवस्थामें भी सताती है । जो ईश्वर सम्पूर्ण ब्रह्माण्डका पालन पोषण करते हैं, वे उनके बच्चोंका ध्यान नहीं रखेंगे क्या ?; इसलिए बाल्यकालसे साधना सिखानी चाहिए; क्योंकि यह सामान्य सी बात भी मात्र साधनासे ही आती है !



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