श्रीगुरु उवाच


विवाहोपरान्त भी मायकेका उपनाम लगाकर हिन्दू संस्कृतिके ‘दूसरेसे एकरूप होने’के मूलभूत सिद्धान्तको नकारना, स्त्रीमुक्ति नहीं !
विवाहके उपरान्त स्त्रियां अपने नामके साथ ससुरालका उपनाम लगाती हैं, यह हिन्दू संस्कृतिकी प्राचीन परम्परा है । आजकल आधुनिक विचारोंसे प्रभावित कुछ महिलाएं स्त्रीमुक्तिके नामपर मायके एवं ससुराल, दोनोंके उपनाम लगाती हैं । ‘स्व’का त्यागकर दूसरेमें विलीन होना, हिन्दू धर्मका मूलभूत सिद्धान्त है । परम्परागत रूपसे विवाहके उपरान्त विवाहिताद्वारा ससुरालका उपनाम लगानेका उद्देश्य है, ससुरालके परिवारमें विलीन होना ।
अनेक सन्त भी अपने शिष्योंके नाम परिवर्तित करते हैं, जिसके अनेक उदाहरण हैं । शिष्योंके नाम परिवर्तित करनेके पीछे ‘वे नामसहित अपने सर्व संस्कार एवं अहंभाव त्यागकर गुरुसे एकरूप हों’, ऐसा विचार रहता है । यही प्रक्रिया स्त्रीद्वारा विवाहोपरान्त मायकेका नाम त्यागकर ससुरालका नाम अपनानेमें होती है । तात्पर्य, विवाहोपरान्त स्त्रीका उपनाम परिवर्तित करनेके पीछे उसे बन्धनमें डालनेका नहीं; अपितु आध्यात्मिक दृष्टिसे उन्नत करनेका उद्देश्य है; इसलिए विवाहित स्त्रियोंद्वारा मायकेका उपनाम लगाना, दूसरोंमें विलीन होनेके आध्यात्मिक उद्देश्यका अवसर गंवाना है । – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था



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