एक व्यक्तिने पत्रके माध्यमसे पूछा है कि कुछ सन्त, विश्वयुद्ध है, महाविनाश है, ऐसी निराशाजनक बातें समाजको क्यों बताते हैं ? क्या इससे समाजमें नकारात्मकता नहीं फैलेगी ?


सन्त भविष्यद्रष्टा होते हैं, वे मात्र भविष्यमें होनेवाली कष्टप्रद स्थितियोंके विषयमें अवगत ही नहीं कराते हैं, अपितु उसपर क्या उपाययोजना करना है, यह भी बताते हैं । वे माता समान होते हैं, जैसे एक मां अपनी बुद्धिसे जो भी समझमें आता है, उसे बताकर, अपने बच्चोंको भविष्यमें होनेवाली चूकोंसे या कष्टोंसे बचने हेतु या सतर्क करने हेतु अपने बच्चेको जो वह जानती है, सब सिखाती है, उसी प्रकार सन्त भविष्यमें होनेवाली अप्रिय बातोंको बताकर अपनी करुणा उडेलते हुए समाजको सावधान करते हैं । वे महाविनाशके पश्चात उज्जवल भविष्य लेकर आनेवाले हिन्दू राष्ट्रकी सकारात्मक बातें भी तो बता रहे हैं और साधना करने हेतु तथा अपनी भावी पीढीको उज्जवल भविष्य देनेके लिए योग्य कृत्य करने हेतु भी तो उद्युक्त करते हैं । ऐसे द्रष्टा सन्तोंकी बातें मानकर उसपर मार्गक्रमण करनेसे जीवका रक्षण एवं कल्याण दोनों ही होता है !
  दूसरी बात यह है कि यदि द्रष्टा सन्त भविष्य बताकर समाजको सतर्क न करेंं, तो जब आपातकाल आएगा तो यही समाज उनपर आक्षेप लगाते हुए कहेगा कि सन्तोंको भविष्य दिखाई दे रहा था तो हमें इस भीषणकालकी पूर्वसिद्धता करने हेतु क्यों नहीं कहा गया ?
   कालके प्रवाहमें कुछ बातें अवश्यम्भावी होती हैं, जिन्हें कोई टाल नहीं सकता, वैसे ही इस कालमें तृतीय विश्वयुद्धके साथ भीषण आपातकालका आना और २०२३ में हिन्दू राष्ट्रकी स्थापना, ये अकाट्य सत्य हैं, जिन्हें कोई टाल नहीं सकता !  



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