कुछ लोग कहते हैं कि मुझसे कोई चूक (गलती) होती ही नहीं है; अतः मैं अपनी चूकें कैसे लिखूं ?
जब तक मनका पूर्ण लय नहीं होता तब तक विषय-वासनाओंके संस्कार रहते ही हैं और पूर्ण मनोलयवाले सन्त सम्पूर्ण विश्वमें जितनी हमारी उंगलियां है, उतने भी नहीं हैं !
मनके संस्कारोंका प्रकटीकरण गुण-दोषके रूपमें होता है; अतः यह कहना कि मुझसे कोई चूक होती ही नहीं है, सर्वथा अनुचित है । सामान्यत: बहिर्मुख प्रवृतिके लोग स्वयंके विषयमें एक अच्छी छवि बनाकर रखते हैं और अपने अहंकी पुष्टि हेतु मुझसे कोई चूक नहीं होती है एवं मुझमें कोई दोष नहीं है, ऐसा सोचते हैं । ऐसे लोगोंकी वृत्ति जब तक अन्तर्मुखी नहीं होती है, उन्होंने अपनी चूकें अपने घरके सदस्योंसे या सहसाधकोंसे पूछनी चाहिए । चाहे आपके साथ रहनेवाले लोगोंकी वृत्ति कितनी भी बहिर्मुख हो, वे आपको आपकी दस चूकें त्वरित गिना देंगे !
ऐसी स्थितिमें दूसरोंद्वारा बताई गई चूकोंको सर्वप्रथम मौन होकर सुनकर लेना चाहिए; किन्तु बहिर्मुख प्रवृतिके व्यक्तिसे यह भी नहीं होता है, उसे न अपनी चूकें दिखाई देती हैं और न ही उन्हें दूसरोंके द्वारा बताई गयी चूकें स्वीकार्य होती हैं, वे त्वरित आपकेद्वारा बताई गयी चूकोंपर अपना स्पष्टीकरण देते हुए कई बार तो आपको या परिस्थितिको उत्तरदायी ठहरा देंगे; किन्तु मुझसे यह चूक हुई यह कदापि स्वीकार नहीं करते, यदि आपकी भी स्थिति ऐसी ही है तो सावधान हो जाएं, आपकी भी वृत्ति बहिर्मुख है और आपमें अहंका प्रमाण अधिक है ! यदि ऐसा हो तो ईश्वरसे प्रार्थना करें कि हे प्रभु मेरे अहम् और दोषोंका मुझे भान होने दें, मैं अपनी दिनचर्याके मध्य होनेवाली चूकोंको ढूंढ सकूं एवं यदि कोई मेरी चूक बताए तो उसे स्वीकार कर सकूं, ऐसी आप कृपा करें । मैंने पाया कि अधिकांश मनोरोगी अपनी चूकें स्वीकार नहीं कर पाते हैं और उन्हें ऐसा लगता भी नहीं है कि उनमें अहंका प्रमाण अधिक है । आज समाजमें मनोरोग बढनेका मुख्य कारण अपने दोष और अहंकारपर ध्यान न देना ही है ।
विनम्र जीवको अपनेमें अत्यधिक दोष और अहंकार दिखाई देता है, वह स्वयंद्वारा हुई चूकोंपर स्वयंप्रेरित होकर उसे स्वीकार करता है एवं कोई गम्भीर चूक होनेपर उसे स्वतः ही आत्मग्लानि होती है और वह प्रायश्चचित्त भी लेता है ।
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