जिनमें तमोगुणका प्रमाण अधिक होता है, उनमें स्वार्थरुपी दुर्गुण भी अधिक होता है । स्वार्थी व्यक्ति सदैव स्वयंके विषयमें या ‘अधिकसे अधिक’ अपने परिवारके विषयमें विचार करता है, यह मोह, उसे कब अधर्म करने हेतु प्रवृत्त कर देता है, उसे भी ज्ञात नहीं होता ! आजके अधिकांश भ्रष्ट नेता, अधिकारीगण, व्यापारीगण, इन सबके लिए राष्ट्र और समाज हितका कोई महत्त्व नहीं होता, वे अपने स्वार्थमें अंधे होकर कुर्कम करते जाते हैं और एक दिवस उन कुकर्मोंसे अर्जित धन या यशमें वे इतने अहंकारी हो जाते हैं कि उन्हें यह ज्ञात ही नहीं होता है कि उन्होंने यह जन्म नहीं अपितु अनेक जन्मोंके लिए अपने दुःख भोगने हेतु अपना खाता खोल लिया है !; अतः स्वार्थरुपी दुर्गुणको अपने ऊपर हावी नहीं होने देना चाहिए । – पूज्या तनुजा ठाकुर (१७.८.२०१८)
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