जब मैंने ‘उपासना’के माध्यमसे स्वतन्त्र रूपसे लोगोंको साधनासे सम्बन्धित मार्गदर्शन आरम्भ किया तो मुझे ज्ञात हुआ कि स्वाभावदोष निर्मूलन करवाना, यह कलियुगमें साधना हेतु अति आवश्यक चरण क्यों है ? और विशेषकर यदि साधककी वृत्ति तमोगुणी और बहिर्मुख हो तो इसे सर्वप्रथम आरम्भ करनेसे ही साधना आरम्भ हो सकती है । आज सर्वसामान्य लोगोंमें दूसरोंका विचार करना, समयका पालन करना, स्वच्छ और व्यवस्थित रहना, अनुशासनका या नियमका पालन करना, यह सर्वसामान्य गुण भी नहीं है, ऐसे लोगोंको साधना और अध्यात्म बतानेसे भला क्या लाभ हो सकता है ?
हमारे श्रीगुरुने ‘स्वाभावदोष निर्मूलन’की प्रक्रिया सिखाई, यह सोचकर मन कृतज्ञतासे भर उठता है । इतनी ऊंचाईपर होते हुए भी उन्होंने सामान्य लोगोंके उद्धारके लिए, विकार निर्मूलनकी सरल मानसिक पद्धति बताई (जिसे स्वभाव दोष निर्मूलन प्रक्रिया कहते हैं), यह सोचकर उनके द्रष्टापणके प्रति मन नतमस्तक हो जाता है और मुझे भान हुआ कि अल्प दोष होनेके कारण ही मैं अध्यात्ममें शीघ्र आगे जा पाई और यह मेरे माता-पिताद्वारा योग्य मार्गदशन और आध्यात्मिक लालन-पालनका ही परिणाम है । आजकलके रजोगुणी और तमोगुणी लोग, अपने बच्चोंमें भी ढेरों दोषोंका संक्रमण कर देते हैं, जिसकारण उसका प्रथम कुछ वर्ष तो मात्र दोषोंको दूर करनेमें ही चला जाता है ।
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