इसका कारण यह है कि इसमें, स्वयंके रुपये अथवा कागदपर (कागज) हस्ताक्षर कर, वे कागद (कागज) देने होते हैं । इसके लिए विशेष श्रम नहीं करना पडता । इसके विपरीत तनका त्याग करनेके लिए कई वर्षोंतक सेवा करनी पडती है तथा मनका त्याग करनेके लिए नामजप तथा स्वभावदोष निर्मूलन हेतु स्वयंसूचना देनेका कार्य भी कई वर्षोंतक करना पडता है । – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था
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