एक युवा जिज्ञासु जो कुछ दिवसोंसे हमारी संस्थासे जुडे थे, अपने पिताजीके आग्रहपर एक गीतापर भाष्य लिखनेवाले प्रसिद्ध अध्यात्मविदसे मिलने गए । उस युवाने उनसे साधना सम्बन्धित कुछ प्रश्न पूछे, जिनका वे सन्तोषपूर्वक उत्तर तो नहीं दे सके; किन्तु उन्हें विवाह करने हेतु उपदेश देकर उनके मनमें संशय निर्माण कर दिए ।
उस युवामें ईश्वरप्राप्तिकी उत्कण्ठा है एवं उसका अध्यात्मिक स्तर भी पचास प्रतिशत है, तब भी उन अध्यात्मिविदने उस युवाको अयोग्य मार्गदर्शन देकर उसे दिग्भ्रमित किया और इतना ही नहीं वे आजके नेता समान उस युवाको अपने आश्रममें जुडने हेतु स्वयंद्वारा लिखित गीतापर टीका, उनके हाथमें थमा दी । ये अध्यात्मविद इस बारके उज्जैनके कुम्भ मेलेमें भी ‘सनातन संस्था’के शिविरमें सेवारत युवा साधकोंको अपने आश्रमसे जुडने हेतु उकसा रहे थे, ऐसा हमें पता चला ।
आजके कालमें युवाओंको ‘कम से कम’ कुछ वर्ष अपने वैयक्तिक स्वार्थको त्यागकर राष्ट्र और धर्म हेतु कार्य करनेकी अत्यधिक आवश्यकता है, क्योंकि धर्म और राष्ट्रका रक्षण होगा तो ही उनकी अगली पीढी सुखी और सुरक्षित रहेगी और पचास प्रतिशत आध्यात्मिक स्तरवाले युवामें यदि ईश्वरप्राप्तिकी तीव्र उत्कण्ठा हो तो उनका विवाह करना आवश्यक नहीं होता, यह सामान्यसी बात जिस अध्यात्मविदको समझमें नहीं आती है, वे क्या गीतापर भाष्य करनेके अधिकारी हो सकते हैं ? और उनके ऐसे अपूर्ण और अर्धसत्य भाष्यसे समाजको कितनी हानि हो सकती है इसकी कल्पना करें !
यह मेरे साथ २००१ के महाकुम्भमें हुआ था, जब मैं ‘सनातन’के मार्गदर्शनमें साधनारत थी, श्रीगुरुके आदेश अनुसार मैं सन्तोंसे भेंटकर उनसे सनातनके कार्य हेतु आशीर्वाद लेनेकी सेवा कर रही थी । अनेक सन्त (तथाकथित कहना अधिक उचित होगा) मुझे, मेरे श्रीगुरुको छोड, अपनी संस्था या आश्रमसे जुडने हेतु स्पष्ट या अस्पष्ट रूपमें संकेत देते थे । वस्तुत: उनके इसप्रकार कहनेसे मेरे श्रीगुरुके प्रति, मेरी श्रद्धा और अधिक दृढ हुई तथा मुझे ऐसा श्रीगुरु मिले, इस हेतु मैंने ईश्वरको कृतज्ञता व्यक्त की । ऐसे सभी अध्यात्मविदोंसे जो एक कलियुगी नेता समान दुसरे गुरुके शिष्योंको अपना शिष्य बनाना चाहते हैं, उनसे एक विनम्र विनती करना चाहती हूं कि यदि आपको सात्त्विक युवा जिज्ञासु, मुमुक्षु और साधक चाहिए तो अपने भीतरके साधकत्वको बढाएं ! जिस प्रकार पुष्प कभी मधुमक्खियोंको अपने मकरन्दके अस्वादन हेतु आमन्त्रित नहीं करता है, उसीप्रकार अपनी साधनाके तेजको बढाएं !, सुपात्र शिष्य आपके पास स्वयं ही आ जाएंगे और दूसरे अध्यात्मविदोंसे जुडे साधकोंको स्वयंसे जुडने हेतु कहकर अपनी गरिमाको कलंकित न करें ! (९.७.२०१६)
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