उच्चतम न्यायालयका बडा निर्णय, आरक्षणका लाभ केवल एक ही राज्यमें ले सकेंगे !


अगस्त ३१, २०१८

उच्चतम न्यायालयने अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति (एससी एसटी) वर्गको राज्यकी चाकरीमें (नौकरियोंमें) आरक्षणका लाभ देनेके प्रकरणमें महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए कहा है कि अपने राज्यमें एससी एसटी सूचीमें सम्मिलित व्यक्ति दूसरे राज्यकी शासकीय चाकरीमें आरक्षणका लाभ नहीं प्राप्त कर सकता ।

न्यायालयने दिल्लीके बारेमें व्यवस्था देते हुए कहा है कि दिल्लीकी नौकरियोंमें आरक्षणके केन्द्रीय प्रावधान लागू होंगे । यह निर्णय न्यायाधीश रंजन गोगोईकी अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशोंकी पीठने बहुमत से सुनाया है । पीठके शेष न्यायाधीश जस्टिस एन रमना, जस्टिस आर भानुमति, जस्टिस एम शान्तनगौडर और जटिस्स एस अब्दुल नजीर थे ।

न्यायालयने कहा कि एक व्यक्ति जो एक राज्यमें अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति वर्गमें प्रविष्ट है, उसे दूसरे राज्यमें जाने पर अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजातिका लाभ नहीं मिल सकता । अनुच्छेद ३४१ और ३४२ में मिले हुए आरक्षणके संवैधानिक लाभ उस राज्यकी सीमातक ही सीमित हैं, जिस राज्यकी सूचीमें वह जाति सम्मिलित है ।

एक राज्यका अनुसूचित जनजाति निवासी दूसरे राज्यमें उस वर्गका होनेका दावा नहीं कर सकता । न्यायालयने कहा कि राष्ट्रपति अनुच्छेद ३४१ और ३४२ के अन्तर्गत अनुसूचित जाति और अनूसूचित जनजातिकी सूची किसी राज्यके बारेमें जारी करते हैें । वह सूची किसी विशेष राज्यकी भौगोलिक स्थिति देखते हुए उसीके बारेमें जारी होती है । राज्य उसमें कोई भी बदलाव नहीं कर सकता, न ही स्वयं उसका दायरा बढा सकता है । यदि राज्य किसी वर्गको उसमें लाभ देना चाहता है तो उसे उसके लिए निर्धारित प्रक्रियाका पालन करना होगा ।

राज्यको अपना रूख केन्द्रीय अधिकारीको बताना होगा ताकि संसदीय प्रक्रियाके अन्तर्गत उस राज्यकी अनुसूचित जाति जनजाति सूचीमें संशोधन करके उसे जोडा जाए । राज्य ‘अनुच्छेद १६(४)’के अन्तर्गत एकपक्षीय निर्णय लेकर उसमें बदलाव नहीं कर सकता । न्यायालयने कहा कि यदि ऐसा होने लगेगा तो अव्यवस्था हो जाएगी; इसलिए संविधानमें इसकी आज्ञा नहीं दी गई है । यद्यपि न्यायमूर्ति आर भानुमतिने बहुमतकी पीठसे असहमति दिखाई है और अलग से उसके कारण दिए हैं । न्यायालयने अपने निर्णयमें इस पर दिए गए पूर्व निर्णयपर विस्तृत चर्चा करते हुए संविधान पीठको विचारके लिए भेजे गए प्रश्नका उत्तर दिया है ।

 

“यह निर्णय प्रशंसनीय है, परन्तु देशको विनाशसे रोकने हेतु आरक्षणपर पूर्ण प्रतिबन्ध आवश्यक है” – सम्पादक, वैदिक उपासना पीठ

 

स्रोत : दैनिक जागरण



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