अब जनगणनामें बताया जाएगा पिछडी जातियोंका अलग से ब्यौरा !


सितम्बर १, २०१८

शासनने देशमें प्रथम बार अनुसूचित वर्गकी जनगणना करानेका निर्णय लिया है । २०२१ में जनगणनाके समय अन्य पिछडी जातियोंके (ओबीसी) अंक-विवरण अलग से जुटाए जाएंगे । अनुसूचित जातिके नेताओंकी ओर से लम्बे समय से पिछडी जातियोंकी जनगणना करानेकी मांग की जा रही थी, ताकि आरक्षण और अन्य विकास योजनाओंमें उनकी उचित भागीदारी सुनिश्चित की जा सके । इसके पूर्व शासन विपक्षके सभी अडचनोंके पश्चात अनुसूचित जाति-जनजाति आयोगको संवैधानिक पद दिलानेमें सफल रही है ।

शुक्रवारको गृह मन्त्री राजनाथ सिंहने २०२१ की जनगणनाकी तैयारियोंकी समीक्षाके समय अनुसूचित जातिके अंक-विवरण अलग से जुटानेका निर्देश दिया । अभी तक देशमें इनके उचित जनसंख्या विवरण नहीं हैं । तीन वर्षके भीतर जारी होंगे अंक-विवरण बैठकमें राजनाथ सिंहने इस बार जनगणनामें अत्याधुनिक तकनीकका आश्रय लेनेका निर्देश दिया, ताकि जनगणनाके विवरणको तीन वर्षके भीतर जारी किया जा सके । इसके पूर्व जनगणनाके सारे विवरण सार्वजनिक होनेमें सात से आठ वर्षका समय लग जाता था । माना जा रहा है कि जनगणनाके त्वरित अंक विवरणके लिए २५ लाख लोगोंको विशेष प्रशिक्षण दिया जाएगा । १९३१ के अंक विवरणपर आधारित है । मण्डल कमीशनका विवरण मण्डल कमीशनके आधारपर ओबीसीको २७ प्रतिशतका आरक्षण दे दिया गया; लेकिन मण्डल कमीशनका विवरण १९३१ की जनगणनाके विवरणपर आधारित था । २००६ में ओबीसीकी जनसंख्या ४१ प्रतिशत बताई गई ।

राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठनने (एनएसएसओ) २००६ में एक सर्वेक्षण विवरण जारी किया था, इसमें बताया गया था कि देशकी कुल जनसंख्यामें से ४१ प्रतिशत ‘ओबीसी’की है । संगठनने देशके ७९३०६ ग्रामीण घरों और ४५३७४ नगरके घरोंका सर्वेक्षण कर यह विवरण तैयार किया था ।

२०११ में संप्रगने कराई सामाजिक आर्थिक गणना
पिछली संप्रग शासनने २०११ में देशमें सामाजिक -आर्थिक-जातीय गणना कराई थी । इसके निष्कर्ष तीन जुलाई २०१५ को वर्तमान शासनने जारी किए थे ।

शासनने ‘ओबीसी’की अलग से जनगणना करानेका निर्णय कर स्पष्ट कर दिया है कि वह ‘ओबीसी’को देशके विकासमें भागीदार बनानेके प्रति गम्भीर है । २०१९ के मतदानके पूर्व ओबीसीकी जनगणना करानेकी घोषणा और ओबीसी आयोगको संवैधानिक पद देना, राजनीतिक और चुनावी रूप से काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है ।

“क्या पहले से इस देशके जातिगत कम भाग हुए हैं, जो अब निधर्मी शासन तन्त्र इन्हें भिन्न बताकर अलग करना चाहता है ! अब ‘हिन्दू राष्ट्र’ अति अनिवार्य है, अन्यथा ये राजनेता निजी स्वार्थके लिए देश बेचने से भी पीछे नहीं हटेंगे” – सम्पादक, वैदिक उपासना पीठ

 

स्रोत : दैनिक जागरण



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