बात उन दिनोंकी है जब मीराबाईके पति, उनकी साधनामें अत्यधिक अडचनें निर्माण करने लगे थे । ऐसेमें उनके लिए साधना करना और भी कठिन हो गया ! वे द्वन्द्वमें फंस गई, एक ओर उनका स्त्रीधर्म जो उन्हें पतिसे विमुख होकर साधना करने हेतु रोक रहा था और दूसरी ओर कृष्णसे एकरूप होनेकी उनकी तीव्र उत्कण्ठा, वे सोचने लगीं कि इस विषयमें किनसे मार्गदर्शन लिया जाए ? उस समय उत्तर भारतमें सन्त तुलसीदासको उच्च कोटिके सन्तके रूपमें मान्यता प्राप्त हो चुकी थी । उन्होंने उन्हें पत्र लिखकर अपने द्वन्द्वके समाधान हेतु विनती की । सन्त तुसलीदासजीने उनका मार्गदर्शन करते हुए दोहेमें दो पंक्तियां लिखीं, जिसका अर्थ था जो रामका प्रिय नहीं, वह हमारा भी प्रिय नहीं अर्थात जो भक्त नहीं, ऐसे व्यक्तिका परित्याग करनेमें कोई पाप नहीं लगता; अतः उनकी शंकाका समाधान हो गया और वे संन्यास लेकर कृष्णभक्ति और उनके प्रसारमें लीन होकर कृष्णसे एकरूप हो गईं ।
ऐसी परिस्थतिमें एक और तथ्यका ध्यान रखना चाहिए, जब किसी जीवका गर्भमें आगमन होता है तो प्रथम मनुष्य रूपमें होता, तत्पश्चात् कुछ माह उपरान्त ही उस जीवका लिंग निर्धारण होता है और प्रत्येक मनुष्यका मूल धर्म है, अपने निज स्वरुपसे एकरूप होना और यह ईश्वर प्रदत्त अधिकार सभी मनुष्यको बिना लिंग, जाति, क्षेत्र, सम्प्रदाय इत्यादिके भेदके प्राप्त हैं ।
स्त्रियोंके लिए ईश्वरप्राप्तिके दो मार्ग हैं – एक अपनी पत्नीधर्मको पूर्ण निष्ठासे पालन कर अपने पतिसे एकरूप होना और दूसरा सर्वस्वका परित्याग कर सन्यास लेकर या पूर्ण समय साधना कर ईश्वरसे एकरूप होना । सर्वस्वके परित्यागमें पतिका भी त्याग, यदि पत्नी करती है तो भी उसे पाप नहीं लगता । मात्र स्त्रियोंके लिए संन्यास लेकर साधना करना पुरुषोंकी अपेक्षा अधिक कठिन होता है और संन्यास लेते समय स्त्रीका आध्यात्मिक स्तर ६०% से अधिक होना चाहिए और यदि किसी योग्यगुरुके संरक्षणमें साधना कर रही हों तो ५०% आध्यात्मिक स्तरपर भी पूर्ण समय साधना हेतु अपने गुरुसे मार्गदर्शन ले सकती हैं या पूछ सकती हैं ।
– तनुजा ठाकुर
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