देवबन्दी उलेमाकी टिप्पणीसे आगबबूला हुई फरहा फैज, ‘शरई अदालत’को लेकर दिया बडा वक्तव्य !


सितम्बर ४, २०१८

उच्चतम न्यायालयकी अधिवक्ता फरहा फैज सोमवारको पुनः समाचार माध्यमोंके सामने आई और देवबन्दी उलमाद्वारा की गई टिप्पणीका उत्तर देते हुए कहा कि वह अपना कार्य अच्छे से कर रही हैं, इसलिए उन्हें अन्तर्राष्ट्रीय स्तरपर प्रसिद्धीकी आवश्यकता नहीं है । इसके साथ ही उन्होंने ‘शरई अदालत’ नामपर आपत्ति उठाते हुए कहा कि उन्हें इसके कार्य से नहीं, बल्कि नाम से परेशानी है । ‘दारुलकजा’का नाम मिडिएशन सेण्टर (समझौता केन्द्र) होना चाहिए । ‘अदालत’ नाम रखनेका अधिकार किसी भी अशासकीय संगठनको (एनजीओ) नहीं है ।

फरहा फैजने कहा कि दारुलकजा (शरई अदालत) जिस प्रकार कार्य करती हैं, उसके अनुसार उसका नाम ‘मिडिएशन सेण्टर’ रखा जाना चाहिए; क्योंकि एक देश और एक संविधानमें दो-दो न्यायालय नहीं हो सकते ! तीन तलाक, बहुविवाह और ट्रिपल तलाकका विरोध करते हुए फरहा फैजने कहा कि जिस प्रकार ‘हिन्दू और इसाई मैरिज एक्ट’ बना हुआ है उसी प्रकार ‘मुस्लिम मैरिज एक्ट’का होना भी आवश्यक है ।

उन्होंने कहा कि मुस्लिम बच्चें मदरसों तक सीमित न रहकर, उच्च शिक्षा ग्रहण कर, मुख्यधारासे जुडे इसके लिए उन्होंने प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदीको पत्र लिखकर मांग की है कि देशमें ऐसा विश्वविद्यालय स्थापित किया जाए, जहां धार्मिक शिक्षाके साथ-साथ आधुनिक शिक्षा भी दी जाए । एक प्रश्नपर फरहा फैजने कहा कि उनका राजनीतिमें आनेकी इच्छानहीं है, बल्कि उनका उद्देश्य सम्पूर्ण शक्तिके साथ महिलाओंके अधिकारोंकी लडाई लडना है, जिसके लिए वह निरन्तर कार्यरत हैं ।


उल्लेखनीय है कि फरहा फैजने रविवारको भी प्रसार माध्यमोंके सामने अपनी बात रखी थी । तीन तलाककी मुख्य याचिकाकर्ता व उच्चतम न्यायालयकी अधिवक्ता फरहा फैजने कहा कि ‘तीन तलाक बिल’को लेकर मुस्लिम समुदायको कोई आपत्ति नहीं है; लेकिन कुछ कट्टरपन्थी नहीं चाहते कि मुस्लिम समाज उनकी कैदसे स्वतन्त्र हो । वो चाहते हैं कि मुस्लिम समुदाय आंख और कान बन्द कर उनका दास बना रहे। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ कट्टरपन्थी ‘तीन तलाक बिल’में बाधा हैं, उन्हें लगता है कि यदि इसपर विधान पारित हो गया तो उनका अस्तित्व समाप्त हो जाएगा; इसलिए वह मुस्लिम समाजको भ्रमित कर रहे हैं । देश पर बलात् शरीयत थोपने वालोंपर देशद्रोहका अभियोग चलना चाहिए । फरहा फैजने कहा कि इस विधानको दारुल उलूम व मुस्लिम संगठन नहीं मानेंगे, क्योंकि इनके पास तलाक, निकाह, हलाला बहुविवाहके ‘फतवों’के अतिरिक्त कुछ नहीं है । उन्होंने ‘ऑल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड’पर कटाक्ष करते हुए कहा कि यह केवल दारुल उलूमका एक निर्मिति मात्र है ! वहीं दारुल उलूमपर आरोप लगाते हुए फरहाने कहा कि उसकी विचारधाराके मदरसे आतंककी शिक्षा देते हैं !

स्रोत : अमर उजाला



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