सितम्बर ४, २०१८
राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजित डोभालने मंगलवारको कहा कि जम्मू-कश्मीरके लिए भिन्न संविधान होना, सम्भवत: एक चूक थी । उन्होंने इस बातपर भी बल दिया कि सम्प्रभुता से कभी समझौता नहीं किया जा सकता । डोभालने कश्मीरपर यह टिप्पणी ऐसे समयमें की है, जब उच्चतम न्यायालय संविधानके ‘अनुच्छेद ३५-ए’की संवैधानिक वैधताको चुनौती देने वाली याचिकाओंपर सुनवाई कर रहा है । ‘अनुच्छेद ३५-ए’के अन्तर्गत जम्मू-कश्मीरके स्थायी निवासियोंको विशेष प्रकारके अधिकार और कुछ विशेषाधिकार दिए गए हैं । ‘अनुच्छेद ३५-ए’ जम्मू कश्मीर विधानसभाको लेकर प्रावधान करता है कि वह राज्यमें स्थायी निवासियोंको पारभाषित कर सके । देश स्वतन्त्र होनेके पश्चात वर्ष १९५४ में १४ मईको राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसादद्वारा एक आदेश पारित करके संविधानमें एक नूतन ‘अनुच्छेद-३५ ए’ जोडा गया था ।
यह राज्य विधायिकाको यह अधिकार देता है कि वह कोई भी विधान (कानून) बना सकती है और उनको अन्य राज्योंके निवासियोंके साथ समानताका अधिकार और संविधानद्वारा प्राप्त किसी भी अन्य अधिकारके उल्लंघनके अन्तर्गत चुनौती नहीं दी जा सकती है अर्थात् इससे अन्य राज्योंके लोगोंको कश्मीरमें भूमि क्रय करने, चाकरी करने या विधानसभा मतदानमें वोट करनेपर प्रतिबन्ध है ! इसे समाप्त करनेकी याचिका न्यायालयमें प्रविष्ट की गई है ।
देशके प्रथम उपप्रधानमन्त्री सरदार वल्लभभाई पटेलपर लिखी एक पुस्तकके विमोचन समारोहको सम्बोधित करते हुए डोभालने कहा कि उन्होंने देशकी सशक्त आधारशिला रखनेमें महत्वपूर्ण योगदान किया है । डोभालने इस अवसरपर पटेलको श्रद्धाञ्जलि भी अर्पित की ।
उन्होंने कहा कि सम्प्रभुताको ‘न तो दुर्बल किया जा सकता है और न ही अनुचित प्रकार से परिभाषित किया जा सकता है ।’ उन्होंने कहा, “जब अंग्रेज भारत छोडकर गए तो सम्भवत: वे भारतको एक सशक्त सम्प्रभु देशके रूपमें छोडकर नहीं जाना चाहते थे ।”
डोभालने कहा कि इस सन्दर्भमें पटेलने अंग्रेजोंकी योजना सम्भवतः समझ ली कि वे कैसे देशमें विभाजनके बीज बोना चाह रहे हैं । उन्होंने कहा कि पटेलका योगदान केवल राज्योंके विलयतक नहीं, बल्कि इससे कहीं अधिक है !
स्रोत : आजतक
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