सितम्बर ६, २०१८
सहमति से समलैंगिक सम्बन्धोंको लेकर उच्चतम न्यायालयके निर्णयको कुछ उलमाने प्रकृतिके नियमोंके विरुद्ध बताया है । इनका कहना है कि मानवीय विधान परिवर्तनीय; लेकिन प्राकृतिक अपरिवर्तनीय हैं । इस निर्णय से सभी धर्मोंकी भावनाओंको ठेस पहुंचेगी और इस पर पुनर्विचार करना चाहिए ।
‘जमीयत उलमा-ए-हिन्द’के राष्ट्रीय महासचिव मौलाना महमूद मदनीने कहा, “यह निर्णय भारतके धार्मिक सांस्कृतिक मूल्योंके विरुद्ध है । समाज पहले ही यौन अपराध और हिंसाकी समस्यासे परेशान है । ऐसेमें समलैंगिकताकी आज्ञा देना ठीक नहीं है । गुरुवारको अपने वक्तव्यमें मौलाना मदनीने कहा कि न्यायालयको अपने २०१३ के निर्णयपर कायम रहना चाहिए था । समलैंगिकता मूल प्रकृति-स्वाभाविकता से विरोध है इससे उद्दण्डता, अश्लीलता फैलेगी और यौन अपराधोंमें वृद्धि होगी । मूलभूत अधिकार अपने स्थानपर हैं; लेकिन ऐसा कार्य जिससे मानवीय समाज, परिवार और मानव जातिकी प्रगति प्रभावित हो, उसको स्वतन्त्रताके वर्गमें रखकर उचित बताना अनुचित है । कुछ तत्वोंकी आवाजको आधार बनाकर पूरे समाजको अविश्वास और व्यावहारिक परेशानीमें नहीं डाला जा सकता । इस प्रकारकी आज्ञाके पश्चात अभिभावकोंको अपने युवा बच्चोंके चरित्रके प्रकरणमें अत्यधिक चिन्ता हो जाएगी और अविश्वास पैदा होगा ।”
मदरसा जामिया हुसैनियाके वरिष्ठ उस्ताद मौलाना मुफ्ती तारिक कासमीका कहना है कि इस्लाम धर्ममें विवाह से पूर्व लडका-लडकीके मिलनको अयोग्य बताया गया है, क्योंकि समाजमें ऐसे मिलन अनुचित हैं तो समलैंगिकताके लिए तो धर्ममें कोई स्थान ही नहीं है ।
जमीयत दावातुल मुसलिमीनके संरक्षक इसहाक गोराने कहा कि न्यायालयका निर्णत्र आजकी युवा पीढीके लिए उचित नहीं है । इससे भावी पीढीपर अन्तर पडेगा । हदीसमें आता है यदि कोई पुरुष, पुरुष से या महिला किसी महिलासे सम्बन्ध बनाती है तो यह ‘हराम’ है और ऐसा दोष है, जिसकी अल्लाहके यहां कोई क्षमा नहीं है ।
उन्होंने यह भी कहा कि समलैंगिकतासे रोगोंके साथ-साथ कौटुम्बिक व्यवस्था बिगडती है । इससे मना नहीं किया जा सकता है कि हमें न्यायालयके प्रत्येक निर्णय को मानना चाहिए; लेकिन हम एक लोकतान्त्रिक देशमें रहते हैं और हमें अपनी बात रखनेका पूरा अधिकार प्राप्त है । सभी धार्मिक संगठनोंको चाहिए कि वे न्यायालयमें निर्णयपर पुनर्विचारकी याचिका प्रविष्ट करें ।
स्रोत : अमर उजाला
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