‘संस्कृतनिष्ठ हिन्दी’ भाषाके मूल स्वरुपको नष्ट करनेवाले ‘बुद्धिजीवी’ कहलानेके अधिकारी नहीं हैं !


लगता है हमारे देशके कुछ तथाकथित हिन्दू बुद्धिजीवी वर्गने हिन्दी भाषाके भ्रष्टीकरणका बेडा उठा लिया है ! जब भी किसी पत्रिका या समाचारपत्रको पढती हूं, या कोई समाचार वाहिनीमें (चैनलमें) समाचार सुनती हूं तो एक वाक्यमें चारसे आठ उर्दू एवं अन्य अंगलभाषाके शब्द उसमें दिखाई देते हैं या उनके वाक्योंमें प्रयुक्त होते सुनाई देते हैं !
इस देशके ऐसे हिन्दु बुद्धिजीवी वर्गमें मातृभाषा, स्वभाषा, संस्कृत भाषाके प्रति अभिमान पूर्णत: नष्ट हो चुका है, खरे अर्थोंमें ऐसे बुद्धिजीवी वर्ग अज्ञानतामें समाजका कितना अधिक हानि कर रहे है इसका उन्हें भान भी नहीं है । भारतकी सात्त्विक भाषाओंको दूषित करना पाप है और इसे सभी भाषाविदोंको रोकना ही चाहिए ! क्योंकि जो व्यक्ति अपने विद्वतापूर्ण विचारोंको दूषित भाषामें व्यक्त करे, वह विद्वान कहलानेका अधकारी हो सकता है क्या ? किञ्चित सोचें !



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