लेखन कार्य ईश्वरके आदेशसे आरम्भ हुआ


वर्ष २०११ में ही ईश्वरसे आदेश हुआ कि लेखन आरम्भ करो । हमारे श्रीगुरुके श्रीगुरुकी गद्दीपर इन्दौर स्थित आश्रममें आसीन रामानन्द महाराज, ‘वैदिक उपासना पत्रिका’के विशेषांक, जो ‘मासिक’से पूर्व छपते थे, उसके लेखको देखकर बहुत प्रसन्न होते थे और उसे अपने भक्तोंको दिखाकर, पढते थे, उन्हें उसके लेख अच्छे लगते थे ! इसके पश्चात २०१६ में श्रीगुरुने ईश्वरके उस आदेशकी पुष्टि करते हुए कहा “आप लिख सकती हैं, इसलिए लिखें, जब अब आप इस देहमें नहीं होंगी तो भी आपके लेख, लोगोंका मार्गदर्शन करेंगे ।”
 पिछले वर्ष देवराहा बाबाके आश्रममें उनकी गद्दीपर आसीन सन्त हंस बाबा भी, ‘वैदिक उपासना पत्रिका’ देखकर बहुत प्रसन्न हुए और मुझसे राष्ट्र व धर्मके विषयमें कुछ संवाद करते हुए सन्तोंका कार्य किस प्रकार समाज परिवर्तन हेतु सूक्ष्मसे हो रहा है, यह बताया, जो उनके शिष्योंके अनुसार, ऐसी बातें वे सामान्यत: करते नहीं है और उसके पश्चात सबको भक्तोंके समक्ष मेरे विषय कुछ कहा और मुझे लिखनेका आशीर्वाद देते हुए कहा, “लिखना चाहती हो ?” मैंने कहा, “आप जैसा आदेश दें”, तो उन्होंने कहा, “नेत्र बन्द करो” और उन्होंने मुझपर शक्तिपात किया, उस समय वहां मुझे गद्दीपर साक्षात देवराहा बाबा दिखाई दिए ! जब वे मुझपर शक्तिपात कर रहे थे तो मेरे लिखे हुए शब्द ब्रह्माण्डमें सर्वत्र उड रहे थे, ऐसा मुझे प्रतीत हुआ ।
यह मैं क्यों कह रही हूं ?, क्योंकि मेरा शिक्षण अंग्रेजी माध्यममें हुआ है और जब मैं लिखती हूं तो कभी-कभी अन्त:प्रेरणासे हिन्दीके ऐसे शब्द लिखे जाते हैं कि मुझे वह शब्द हिन्दीकोषमें है क्या या उसका अर्थ वाक्य अनुसार उचित है क्या ?, इस हेतु मैं गूगलपर जाकर उसे देखती हूं और पाती हूं कि वह शब्द है और वाक्य अनुसार सटीक है, इससे मुझे भान होता है कि ईश्वर, गुरु और सन्तकी इच्छा है, इसलिए मैं लिखती हूं अर्थात वे मुझे लिखवा कर लेते हैं । अनेक बार तो मैं अपने लेखको पढकर आश्चर्य करती हूं; क्योंकि मुझे लगता है कि इतनी सटीकतासे मैं तो लिख ही नहीं सकती हूं और उन्हें पढकर मेरी ईश्वर और गुरुके प्रति कृतज्ञताके भाव बढ जाते हैं व मैं इसकी कर्ता नहीं, यह ज्ञात होता है । मैं आज क्या लिखनेवाली हूं, यह मुझे ज्ञात नहीं होता, संगणकपर (कम्प्यूटरपर) हाथ रखते ही क्या लिखना है, यह सूझने लगता है; इसलिए दिन भर मुझे यह चिन्तन नहीं करना पडता है कि कल क्या लिखेंगे । हां, समाजके लिए क्या आवश्यक है ?, इसका चिन्तन कुछ क्षणोंके लिए लेखनसे पूर्व अवश्य कर लेती हूं ।  – तनुजा ठाकुर



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