श्रीगुरु उवाच


भाव, श्रद्धा और भक्तिमें अन्तर
१. १. भाव : देवताके अस्तित्वका अनुभव
२. श्रद्धा : दृढ विश्वास कि भगवान सदैव अच्छा करते हैं ।
३. भक्ति : जो विभक्त नहीं होता वह भक्त है, अर्थात जो भगवानसे एकरूप हुआ  है । साधनाके प्रथम चरणमें भाव होता है । उसका अगला चरण है, श्रद्धा और अन्तिम चरण, भक्ति । इसीलिए हम साधनामें भावोत्पत्तिको पहला स्थान देते हैं ।



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