सतत सूक्ष्म स्तरके अनिष्ट आक्रमणोंके कारण देह अब इतनी अशक्त हो गई है कि अब बाहर जाकर प्रसार करना कठिन हो गया है; इसलिए एक ही स्थानपर बैठकर क्या करूं कि समाज साधनारत हो यह विचार करते रहती हूं । कल प्रातः पौने चार बजे जब साधना करने बैठी तो सिरमें एक विचित्र प्रकारका तनाव अनुभव हुआ, सिरके सारे नसें जैसे तन गईं और एक विचित्र प्रकारका कष्ट अनुभव हुआ, मैंने सोचा यह कैसा विचित्र कष्ट हो रहा है ?, वह भी ध्यानके मध्य ! ध्यान समाप्त होनेपर भी वह तनाव अनुभव हो रहा था; अतः मैंने भगवानजीसे पूछा, “नाथ यह कैसा विचित्र कष्ट है ?” उन्होंने कहा, “तुम तो आनन्दमें रहती हो, तनाव क्या होता है इसका भान कहां है तुम्हें ? कुछ क्षणोंके लिए इस विश्वव्यापी मनुष्यलोकसे तुम्हारा सूक्ष्म देह एकरूप हो गया था और इसी प्रकारके तनाव आजके इस साधनाविहीन और धर्मविहीन समाजसे पीडित है, इसलिए तुम्हें यह कष्ट हो रहा है, कुछ क्षणोंमें यह कष्ट चला जाएगा ।” भगवानजीका यह सन्देश सुनकर मन ऐसे ही आहत हुआ जैसे एक माता अपने बच्चेकी वेदना जानकर होती है तो सोचने लगी और क्या करूं तो विचार आया कि जो सचमें जिज्ञासु या साधक वृत्तिके हैं, उन्हें साधनामें मार्गदर्शन किया जाए तो वे और साधक निर्माण करेंगे इससे समाज तनावविरहित होने लगेगा; इसलिए ‘साधना’ नामक गुट ‘व्हाट्सऐप्प’पर आरम्भ किया, सोचा एक ही स्थानपर रहकर भी यदि ईश्वर मेरे माध्यमसे कुछ लोगोंकी साधना आरम्भ करा दें तो इससे अच्छा और क्या हो सकता है और इस प्रयासके बहुत उत्साहवर्धक प्रतिसाद मिलने भी लगे हैं !
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