श्रीगुरु उवाच


गुरुकृपायोगमें स्वभावदोष तथा अहं निर्मूलनको प्रधानता दी जाती है । कारण, सत्ययुगमें स्वभावदोष तथा अहं नहीं थे । त्रेता तथा द्वापर युगोंमें स्वभावदोष तथा अहंमें वृद्धि होती गई, तब भी वे एक मर्यादामें थे । कलियुगमें इनमें अतिशय वृद्धि होनेसे इन्हें न्यून करना आवश्यक है; इसलिए गुरुकृपायोगमें इन्हें न्यून करनेको प्रधानता दी जाती है । वह साध्य होनेपर ज्ञानयोग, कर्मयोग, भक्तियोग, हठयोग, कुण्डलिनीयोग इत्यादि किसी भी योगमार्गसे प्रगति सम्भव है । – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था  



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