सतर्क होकर करें ब्राह्मण वर्णकी साधना


समाजको साधना हेतु प्रवृत्त करते समय या धर्मशिक्षण देते समय अर्थात ब्राह्मण वर्णकी साधना करते समय निम्नलिखित तथ्योंका विशेष ध्यान रखें  –
• हम जो भी तथ्य समाजको बताने जा रहे हैं उसका शास्त्रीय आधार होना परम आवश्यक है; अर्थात वह किसी सन्तद्वारा लिखा गया होना चाहिए ।
• समाजको धर्मशिक्षण देनेसे पूर्व साधकोंद्वारा उन तथ्योंको स्वयं अभ्यास कर उसका मनन-चिन्तन कर, उसे आत्मसात करना चाहिए । कथनी और करनीमें भेद होनेसे वाणीमें चैतन्य नाममात्र होता है, ऐसेमें समाज उस तथ्यको शीघ्र आत्मसात नहीं करता ।
• ब्राह्मण वर्णकी सेवासे अहंकारमें अति शीघ्र वृद्धि होनेकी आशंका रहती है, रावण जैसे भक्त एवं महापण्डितका सर्वनाश अहंकारके कारण हुआ; अतः ब्राह्मण वर्णकी सेवा करते समय कर्तापन, गुरु या ईश्वरको अर्पण करना कदापि नहीं भूलना चाहिए । जो भी ज्ञान, जहांसे सीखा है, उसका श्रेय, उन्हें विनम्रतापूर्वक देना चाहिए । ज्ञानदान ईश्वरप्राप्तिका माध्यम हो तो ही वह यज्ञकर्म होता है अन्यथा वह अहंका पोषक कर्म बन जाता है ।
• सन्त पद प्राप्त होनेपर भी हिन्दू धर्मके अनन्त ज्ञान समाहित किए हुए धर्मशास्त्रोंकी शाब्दिक जानकारी न हो, यह सम्भव है; ऐसेमें सामान्य हिन्दू या साधकको सर्वज्ञात हो, यह सम्भव नहीं; अतः यदि हमें कुछ नहीं आता है तो उसे नम्रतापूर्वक स्वीकार कर लेना चाहिए । उसे हम पूछकर बताएंगे, यह कह सकते हैं या मुझे इसका ज्ञान नहीं, आपको इस विषयमें कुछ ज्ञात है तो हमें अवश्य बताएं, ऐसा कहना चाहिए ।
• अपनी स्तुति सुनना टालना चाहिए, इससे अहं बढनेकी आशंका अधिक रहती है, ध्यान रहे ! हमारा मन स्तुतिप्रिय होता है; अतः सतर्क रहना चाहिए, किसीने स्तुति की तो स्वयंको बताना चाहिए कि इस स्तुतिके खरे अधिकारी गुरु या वे आचार्य हैं, जिन्होंने हमें वह ज्ञान दिया है ।
• ब्राह्मण वर्णकी सेवा करनेवाले साधकोंने ज्ञानदानसे अहं निर्माण न हो इस हेतु यह भाव रखना चाहिए कि मांके गर्भसे तो मैंने ज्ञानी होकर जन्म नहीं लिया है; इस संसारमें आनेके पश्चात मुझे आचार्य, सद्गुरु, ग्रन्थ एवं भिन्न माध्यमोंसे ईश्वरने सिखाया है; क्या यदि इन सब माध्यमोंसे मुझे ज्ञान न मिलता तो मुझे ज्ञान होता ?
और ज्ञान देने हेतु सद्बुद्धि ईश्वरने दी है, वाणी मां सरस्वतीकी दी हुई है और इस घोर कलियुगमें श्रोता मुझे सुनते हैं या पाठक मेरे लेखोंको पढते हैं, वह भी ईश्वरकी कृपाका परिणाम है; अतः यदि इनमेंसे कोई एक घटक न हो तो ज्ञान होकर भी क्या लाभ है ?  ईश्वरने ज्ञान दिया, विवेक देकर उसे सद्गुरुके माध्यमसे आत्मसात करवाया तथा उसके प्रसारकी सन्धि दी, इस हेतु मनमें कृतज्ञताका भाव होना चाहिए ।
• ज्ञानदान करते समय इसप्रकार प्रार्थना करनी चाहिए, “ हे प्रभु, सनातन धर्मके अनन्त ज्ञानका एक अंशमात्र भी  मुझे ज्ञात नहीं है एवं इस विश्वमें इतने ज्ञानीजन हैं तथापि आपने मुझ तुच्छको ज्ञानदान देनेकी सन्धि दी है, इस हेतु हम आपके कृतज्ञ हैं । ज्ञानदान करते समय मेरी वृत्ति अन्तर्मुखी रहे, मैं मात्र एक माध्यम हूं और आप ही उसके कर्ता हैं, इस तथ्यका मुझे सदैव ध्यान रहे । जिस ज्ञानको मैं समाजको देने जा रहा हूं, उसे मैं पहले स्वयं आत्मसात करूं एवं तत्पश्चात ही इसे आपके प्रसाद रूपमें प्रसार करूं, यह वृत्ति मुझमें निर्माण होने दें । इस सेवासे  मुझमें नम्रता, शरणागति एवं कृतज्ञताका भाव जागृत रहे, ऐसी आप कृपा करें । मैं ज्ञानी हूं; इसलिए मुझे यह सेवा नहीं दी गई है; अपितु यह सेवा मेरी आध्यात्मिक प्रगति हेतु पूरक है; इसीलिए दी गई है, इस भावसे मैं यह सेवा नित्य कर पाऊं तथा इसके माध्यमसे मेरा एवं समाजका कल्याण हो ऐसी आपके श्रीचरणोंमें प्रार्थना है ।
    जब तक किसी गुरुकी आज्ञा न हो तब तक अपने चरण स्पर्श नहीं करवाने चाहिए, हमारे श्रीगुरु तो साक्षात् परमेश्वरके अवतार हैं, तब भी वे किसीसे अपना चरण स्पर्श नहीं करवाना चाहते हैं, उसका कहना है कि वे भी किसीके शिष्य हैं; अतः किसीसे चरण स्पर्श कैसे करवाएं ? चरण स्पर्शके उनका यह दृष्टिकोण हम सबके लिए अनुकरणीय है । किन्तु यदि ऐसा कोई प्रसंग निर्माण हो जाए और लोग हमारे चरण स्पर्श करने लगे तो उसी क्षण, ‘वह मेरा देह नहीं, मेरे श्रीगुरुका ही देह है और प्रणाम करनेवाले मुझे नहीं, मेरे श्रीगुरुको नमन कर रहे हैं’, यह भाव रख, सब कुछ ईश्वर चरणोंमें अर्पण करना चाहिए ।



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