अपने पुत्रोंद्वारा पिण्डोदक दिए जानेपर ही पितर सुखी व सन्तुष्ट होते हैं । इस सन्दर्भमें “पुत्र किसे कहते हैं ?”, विषयपर महाभारतमें एक श्लोक है :-
पुन्नाम्नो नरकाद्द्यस्मात्पितरम त्रायते सुतः ।
तस्मात्पुत्र इति प्रोक्तः स्वयमेव स्वयम्भुवा ।।
अर्थात पुत्र अपने पितरोंका ‘पु’ नामक नरकसे रक्षण करता है; इसलिए उसे स्वयं ब्रह्मदेवने ही ‘पुत्र’ कहा है । इस श्लोकके अनुसार पितरोंको सद्गति प्राप्त हो, उन्हें यातनाओंसे मुक्ति मिले व पितृलोकसे पितर अपने वंशपर कृपादृष्टि रखें, इस हेतु पुत्र श्राद्ध आदि विधियां करे । इससे स्पष्ट होता है कि स्वयंको पुत्र माननेवालोंका यह कर्तव्य ही है; किन्तु ‘कलियुगी पुत्र’ अपने हित हेतु सर्व कर्म करता है और अपने जीवित माता-पिताके प्रति न ही आदर भाव रखता है न ही वृद्धावस्थामें उनकी प्रेमसे सेवा-शुश्रूषा करता है और उनकी मृत्यु उपरान्त अपने मृत पितरोंकी चित्रकी पूजा कर, अपने सर्वधर्म-कर्तव्योंका निर्वाह कर लिया ऐसा समझता है, इसीलिए उनके पितर उनका जीवन नारकीय कर देते हैं ।
Leave a Reply