हिन्दुओंकी आज मानसिकता ऐसी है कि चाहे पुत्र घरमें निठल्ला बैठा रहे; किन्तु उसने साधना और धर्मकार्य नहीं करना चाहिए, आज धर्मग्लानिका एक मुख्य कारण यह भी है । आज अधिकांश हिन्दू, धर्म हेतु कुछ भी त्याग करनेको तत्पर नहीं होते, उन्हें धर्मसे सब कुछ चाहिए, वह मात्र अपने स्वार्थसिद्धि हेतु धर्मके प्रतीक, देवालयों एवं सन्तोंके आश्रमोंमें जाते है । जबतक हिन्दुओंमें यह ‘ल'(लेने)का संस्कार नष्ट होकर ‘द'(देने)का अर्थात त्याग करनेका संस्कार निर्माण नहीं होगा, व्यक्ति या समाजका उत्थान सम्भव नहीं !
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