कलियुगमें हमारी साधना ‘देवासुर संग्राम’ समान सदैव रहेगी । कभी हमारे अन्दर विद्यमान आसुरी प्रवृत्तियोंके (स्वभावदोष और अहंके लक्षणोंके) साथ तो कभी सूक्ष्म जगतकी आसुरी शक्तियोंके साथ तो कभी बाह्य जगतके दुर्जनोंके साथ । जो साधक, इस मूलभूत तत्त्वको समझकर योग्यप्रकारसे साधना करेगा, उसे ही पूर्णत्वकी प्राप्ति (ईश्वरसे पूर्ण एकरूपता) हो सकती है । अन्य साधक अपनी बुद्धि एवं शब्दजालमें उलझकर, अहंरूपी भ्रमजालमें फंसकर, एक काल्पनिक मुक्तिके भंवरमें फंसे रहेंगे !
Leave a Reply