सांसारिक होकर भी ईश्वरप्राप्ति करना है
सम्भव, संसारमें रहकर साधनारत होना न धर्म विरुद्ध है, न शास्त्र विरुद्ध । मात्र ऐसे जीवकी अपने ध्येयसे भटकनेकी आशंका अधिक होती है; अतः गृहस्थने गुरुगृहमें, अर्थात् आश्रममें जाकर कुछ समय साधना करना चाहिए ! प्रतिदिन थोडे समय एकान्तमें रहकर अपनी साधनाकी समीक्षा करना चाहिए और यथाशक्ति धर्मकार्यमें योगदान देना चाहिए ! यह सब करनेसे आत्मनियन्त्रणकी प्रक्रियाको गति मिलती है । जो सांसारिक होते हुए आध्यात्मिक प्रगति कर, इस भवसागरको पार करता है, ऐसे सदगृहस्थको सन्तोंने नायककी (हीरो) उपाधि दी है ।
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