इंद्रियाणमनुत्सर्गों मृत्यु नापि विशिष्यते ।
अत्यर्थम् पुनरुतसर्ग: सादयेद् दैवतानपि ।। – विदुर नीति
अर्थात इन्द्रियोंको विषयोंसे निवृत्ति मृत्युसे भी अधिक कठिन है और विषयोंमें अत्यधिक प्रवृत्ति तो देवोंको भी नष्ट कर सकती है । अपने मनको नियन्त्रित करना अर्थात विषयोंके प्रति अनासक्त करना, इसीको साधना कहते हैं । यह प्रक्रिया अत्यधिक कठिन है और इसके लिए साधकको एक सतर्क योद्धा समान अनेक वर्ष और कई बार अनेक जन्म प्रयत्न करने पडते हैं । बडे-बडे तपस्वी भी विषयासक्त होकर अपनी अवनति कर चुके हैं; अतः कहा गया हैं कि विषयोंके प्रति जो निर्मोही हो गया वह योगी है, वही पंडित है । विषयोंकी तृप्तिका आवेग देवताओंके देवत्वको भी नष्ट कर सकती है तो हम सामान्य व्यक्तिकी स्थिति विषय भोगोंमें सतत लिप्त होनेसे क्या हो सकती है, इसकी कल्पना कर, अपने मनको विषयोंसे अनासक्त करने हेतु साधना करें । यथार्थमें यदि एक सामान्य व्यक्तिको धर्म और साधनाका आधार न मिले तो उसका जीवन विषयोंसे प्राप्त सुख–दुखके थपेडे झेलनेमें ही व्यर्थ हो जाता है ।
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