अक्तूबर १२,२०१८
मदरसोंको सभी इस्लामिक धार्मिक शिक्षाका केन्द्र मानते हैं; लेकिन उदयपुरके एक मदरसेने इस प्रचलित अवधारणाको परिवर्तित करनेका प्रयास किया है । इस मदरसेने ६ गैर-मुस्लिम छात्रोंके लिए संस्कृतके अध्यापकको नियुक्त किया है ।
राजस्थानके उदयपुरके महावातवाडी क्षेत्रके इस मदरसेमें ५वीं कक्षा उत्तीर्ण करनेके बाद यहां पढने वाले बच्चोंको उर्दूको अपनी तीसरी भाषाके रुपमें चुनना पडता है; लेकिन यहां पढने वाले ६ गैर-मुस्लिम छात्रोंने संस्कृतको अपनी तीसरी भाषाके रुपमें पढना चाहा, जिसके पश्चात मदरसा समितिने यहां संस्कृतके अध्यापककी नियुक्ति की है !
मदरसा समितिके अध्यक्ष मेराज अहमद बताते हैं कि, ‘इस मदरसेकी अच्छी शिक्षा वयवस्था और आधारभूत संरचनाको देखकर संस्थानमें इस वर्ष ६ गैर-मुस्लिम छात्रोंका नामांकन हुआ था ।’ मेराजके अनुसार, ‘मदरसेमें इन बच्चोंका नामांकन राजस्थान मदरसा मण्डलकी अनुमतिके पश्चात लिया गया था ।’
वैसे मदरसेमें नियुक्त नूतन संस्कृत शिक्षक मोमिन कौसरका कहना है कि इस मदरसेमें पढने वाले ये बच्चें घरके पासमें शिक्षाकी सारी सुविधा होनेके कारण यहां पढने आते हैं । इस सम्बन्धमें राजस्थान मदरसा मण्डलके सचिव मोहम्मद सलीम खानने समाचार माध्यमोंसे (मीडियासे) बातचीतके मध्य कहा कि मदरसे समयके साथ आधुनिकताकी ओर पग बढा रहे हैं । वैसे सलीमका यह भी कहना है कि मदरसोंके भीतर शिक्षाकी सारी आधुनिकतम सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएगी, जिससे सभी धर्मोंके बच्चें यहां शिक्षा ले सकें । वैसे राजस्थानके मदरसोंमें प्रातः होने वाली प्रार्थनाके समय वहां पढने वाले सभी विद्यार्थी हिन्दी और अरबीमें प्राथनाएं करते हैं । उसके साथ हीं वो राष्ट्र-गान भी गाते हैं ।
“हम मदरसोंद्वारा लिए इस निर्णयकी प्रशंसा करते हैं, परन्तु वे केवल संख्या बढानेके उद्देश्यसे नहीं करें और मुस्लिम छात्रोंको भी संस्कृतकी अनिवार्य शिक्षा दें !”- सम्पादक, वैदिक उपासना पीठ
स्रोत : जी न्यूज
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