अक्तूबर २४, २०१८
राजस्थानमें अरावलीकी पहाडियोंपर हो रहे अवैध खननपर उच्चतम न्यायालयने कडा रवैया अपना लिया है । न्यायालयमें राजस्थान सरकारने यह स्वीकार किया है कि अरावलीकी १३८ में से २८ पहाडियां लुप्त हो चुकी हैं ! न्यायालयने राज्यके मुख्य सचिवको ४८ घण्टेके भीतर अरावलीके ११५.३४ हेक्टेयर क्षेत्रमेें अवैध खनन रुकवानेके आदेश दिए हैं ।
उच्चतम न्यायालयमें प्रकरणकी सुनवाई करने वाली न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर और न्यायमूर्ति दीपक गुप्ताकी पीठने कहा कि वह यह आदेश देनेके लिए विवश हो गई; क्योंकि राजस्थान सरकारने इस प्रकरणको ‘बहुत ही हल्के’में लिया है ! न्यायालयने यह भी पूछा कि क्या लोग हनुमान हो गए और पहाडियां लेकर भाग गए ! न्यायालयने राज्य सरकारको फटकार लगाते हुए कहा कि राज्य शासन अवैध खनन रोकनेमें पूर्णतया असफल रहा है !
शीर्ष न्यायालयने केन्द्रीय अधिकार प्राप्त समितिके विवरणका भी वर्णन किया कि राज्यके अरावली क्षेत्रमें ३१ पहाडियां अब लुप्त हो चुकी हैं ! पीठने कहा कि दिल्लीमें प्रदूषण स्तरमें बढोत्तरीका एक कारण राजस्थानमें इन पहाडियोंका लुप्त होना भी हो सकता है । पीठने अपने आदेशपर क्रियान्वनके बारेमें एक हलफनामा प्रविष्ट करनेका राज्यके मुख्य सचिवको निर्देश भी दिया है ।
उच्चतम न्यायालयने पर्यावरण मन्त्रालयको ६ सप्ताहके भीतर अध्ययन विवरण प्रस्तुत करनेको कहा था । पर्यावरण मन्त्रालयको यह भी बतानेको कहा था कि निर्माण कार्योंके लिए बजरी या फिर बालू क्यों आवश्यक है ? राजस्थान सरकारने न्यायालयमें हलफनामा प्रविष्ट कर राज्यमें पूर्ण रुपसे बजरीपर प्रतिबन्धको अनुचित बताया था ।
राज्य सरकारने न्यायालयसे मांग की थी कि जिन १२ अनुमति-पत्र धारकोंको (लाइसेंस होल्डरोंको) पर्यावरण स्वीकृति मिल गई है, उन्हें बजरी खननकी आज्ञा दी जाए । न्यायालयने स्पष्ट किया था कि बजरी खननके लिए सबसे पहले यह बताना होगा कि निर्माण कार्योंके लिए बजरी या फिर बालू क्यों आवश्यक है और इनके बिना निर्माण क्यों नहीं हो सकता ?
“जिस वैदिक संस्कृतिमें प्रकृतिको पूजा जाता है, अपनी स्वार्थपूर्ति हेतु हमने उसीका जितना दोहन किया है, यदि वही प्रकृति हमें दण्ड दें और हमें संसाधनोंसे च्युत कर दे तो आश्चर्य कैसा !”– सम्पादक, वैदिक उपासना पीठ
स्रोत : जनसत्ता
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