अक्तूबर २३, २०१८
भारतके छह दशक प्राचीन नागरिकता विधानमें (कानूनमें) संशोधनके लिए लाए गए विवादास्पद विधेयकपर विचार कर रही संयुक्त संसदीय समितिद्वारा (जेपीसीद्वारा) संसदके शीतकालीन सत्रमें विवरण प्रस्तुत किया जाना लगभग निर्धारित है । नागरिकता संशोधन विधेयकपर मंगलवार, २३ अक्तूबरको जेपीसीकी बैठक हुई, जहां भाजपा सांसदोंने इसपर शीघ्र निर्णय लेनेकी मांग की ।
‘जेपीसी’की बैठकमें सम्मिलित भाजपा सांसदोंने कहा कि समिति शीघ्र अपना ब्यौरा बनाकर संसदमें प्रस्तुत करे, ताकि इस विधेयकको शीघ्र वैधानिक रूप दिया जा सके । जेपीसीके अध्यक्ष और मेरठसे भाजपा सांसद राजेन्द्र अग्रवालने बताया, “शीत सत्र व्यावहारिक रूपसे सदनका (१६वीं लोकसभा) अन्तिम सत्र होगा । यदि हमने अपना ब्यौरा प्रस्तुत नहीं किया तो इसका यह अर्थ हुआ कि हमने अपने कार्यको समुचित ढंगसे नहीं किया । इसके अतिरिक्त समितिसे चूक होगी ।”
वहीं बैठकमें सम्मिलित अन्य सदस्योंने विधेयकको लेकर गृह, विदेश और कानून मन्त्रालयके प्रतिनिधियोंसे कई प्रश्न पूछे । ‘जेपीसी’ने तीनों मन्त्रालयोंसे १० दिवसके भीतर सभी प्रश्नोंका लिखित उत्तर मांगा है ।
बता दें कि नागरिकता (संशोधन) कानून, २०१६ को लोकसभामें प्रस्तुत किया गया था । यद्यपि सहमति नहीं बन पानेके कारण इसे ‘जेपीसी’के पास भेज दिया गया था ।
इस विधेयकका उद्देश्य १९५५ के नागरिकता कानूनमें संशोधन करना है । इस विधेयकमें अन्य बातोंके अतिरिक्त इस बातका भी प्रावधान है कि अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तानसे आने वाले हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसियों और ईसाई जैसे अल्पसंख्यक समुदायके लोगोंको भारतमें छह वर्ष रहनेके पश्चात् नागारिकता प्रदान की जाए ! इसके लिए उनके पास समुचित लिखित-पत्र (दस्तावेज) होनेकी आवश्यकता नहीं है । अभी तक इस प्रकरणमें प्रवासकी अवधि १२ वर्ष है ।
इस विधेयकका असम और दूसरे पूर्वोत्तर राज्योंमें कडा विरोध हो रहा है । असममें मंगलवारको ४६ संगठनोंने इस बिधेयकके विरोधमें बंदका आह्वान किया था ।
“क्या यह राष्ट्र हितमें होगा ? केवल हिन्दुओंको ही शरण अपेक्षित है, क्योंकि बौद्ध, पारसी, ईसाई आदि अन्य राष्ट्र हैं, परन्तु अन्य कोई हिन्दू राष्ट्र नहीं ! अतः केन्द्र शासन इसपर समीक्षा करें और इसे हिन्दू हितोंमें ही लाए, ऐसी अपेक्षा है !” – सम्पादक, वैदिक उपासना पीठ
स्रोत : न्यूज १८
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