श्रीगुरु उवाच


पाश्‍चात्य एवं भारतीय संगीत तथा नृत्य : पश्‍चिमी देशोंमें गायन एवं नृत्य मात्र सुख प्राप्तिके लिए किए जाते हैं । इसके विपरीत भारतमें संगीत एवं नृत्य साधनाके प्रकारके रूपमें ६४ कलाओंमें सम्मिलित थे । इसलिए संगीत एवं नृत्य साधनामें ध्यानकी भांति स्थिर बैठे बिना भी, गाते समय और नृत्य करते समय भी ध्यान लगता है ! भक्ति गीत गाते हुए अथवा साथमें नृत्य करते समय भाव भी जागृत होता है ।



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