मनकी एकाग्रता हेतु दोष निर्मूलनकी आवश्यकता : मनमें जितने अधिक विषय-वासनाओंके संस्कार होते हैं, मनमें उतने ही अधिक विचार होते हैं और इससे मनकी एकाग्रता न्यून होती है । मनकी एकाग्रताके अभावमें विद्यार्थीको विषय ग्रहण करनेमें या उसे स्मरण करनेमें कठिनाई होती है । इसे इस देशकी विडम्बना ही कहेंगे कि जिस देशका अध्यात्म इतनी प्रगत अवस्थामें है, वहांके विद्यार्थियोंको इससे सम्पूर्ण विद्यार्थी जीवनमें पूर्णतः दूर रखा जाता है । आजके आधुनिक विद्यालय एवं महाविद्यालयोंमें भिन्न प्रकारसे विषयको समझानेके माध्यमोंके नित्य नूतन प्रयोग हो रहे हैं, किन्तु विषय ग्रहण करने हेतु मनको एकाग्र करना सिखाना चाहिए और इस हेतु स्थूल माध्यम नहीं; अपितु सूक्ष्म स्तरपर प्रयास होना चाहिए; कोई इसपर कोई बल नहीं देता, इससे ही आजकी निधर्मी समाजकी सोचकी दिशा कितनी विपरीत चल रही है, यह समझमें आता है ।
मनकी एकाग्रता साध्य करने हेतु जो भी संस्कार या विषय-वासनाओंके संस्कार अधिक हैं या जो भी दोष प्रबल हैं, उन्हें यदि न्यून करने हेतु प्रयत्न करना सिखाया जाए तो मनकी एकाग्रता स्वतः ही बढ जाएगी और इससे विद्यार्थीका जीवन अधिक यशस्वी होगा । इसलिए हिन्दू राष्ट्रमें पूर्वकाल समान गुरुकुल पद्धतिसे विद्यार्जन करना सिखाया जाएगा, जिसमें दोष निर्मूलन और साधनाके पाठ्यक्रमको, साधनाका अविभाज्य अंग बनाया जाएगा । (क्रमश:)
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